मलिक मुहम्मद जायसी

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मलिक मुहम्मद जायसी
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पूरा नाम मलिक मुहम्मद जायसी
अन्य नाम जायसी
जन्म सन 1397 ई॰ और 1494 ई॰ के बीच
जन्म भूमि रायबरेली ज़िला, उत्तर प्रदेश
मृत्यु '5 रज्जब 949 हिजरी' (सन 1542 ई.)
अविभावक मलिक राजे अशरफ़
मुख्य रचनाएँ पद्मावत, अखरावट, आख़िरी कलाम, कहरनामा, चित्ररेखा
भाषा अवधी
छंद दोहा-चौपाई
शैली आलंकारिक शैली, प्रतीकात्मक शैली, शब्द चित्रात्मक शैली तथा अतिशयोक्ति-प्रधान शैली
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

मलिक मुहम्मद जायसी (जन्म- 1397 ई॰ और 1494 ई॰ के बीच, मृत्यु- 1542 ई.) भक्ति काल की निर्गुण प्रेमाश्रयी शाखा व मलिक वंश के कवि है। जायसी अत्यंत उच्चकोटि के सरल और उदार सूफ़ी महात्मा थे। हिन्दी के प्रसिद्ध सूफ़ी कवि, जिनके लिए केवल 'जायसी' शब्द का प्रयोग भी, उनके उपनाम की भाँति, किया जाता है। यह इस बात को भी सूचित करता है कि वे जायस नगर के निवासी थे। इस संबंध में उनका स्वयं भी कहना है,

जायस नगर मोर अस्थानू।
नगरक नाँव आदि उदयानू।
तहाँ देवस दस पहुने आएऊँ।
भा वैराग बहुत सुख पाएऊँ॥[1]

इससे यह भी पता चलता है कि उस नगर का प्राचीन नाम 'उदयान' था, वहाँ वे एक 'पहुने' जैसे दस दिनों के लिए आये थे, अर्थात उन्होंने अपना नश्वर जीवन प्रारंभ किया था अथवा जन्म लिया था और फिर वैराग्य हो जाने पर वहाँ उन्हें बहुत सुख मिला था।

जन्म

जायस नाम का एक नगर उत्तर प्रदेश के रायबरेली ज़िले में आज भी वर्तमान है, जिसका पुराना नाम 'उद्यान नगर' 'उद्यानगर' या 'उज्जालिक नगर' बतलाया जाता है तथा उसके 'कंचाना खुर्द' नामक मुहल्ले में मलिक मुहम्मद जायसी का जन्म स्थान होना कहा जाता है। कुछ लोगों की धारणा है कि जायसी की जन्म भूमि गाजीपुर में कहीं हो सकती है किन्तु इसके लिए कोई प्रमाण नहीं मिलता। जायस के विषय में कवि ने अन्यत्र भी कहा है,

जायस नगर धरम अस्थानू।
तहवाँ यह कवि कीन्ह बखानू।[2]

इससे जान पड़ता है कि वह उस नगर को 'धर्म का स्थान' समझता था और वहाँ रहकर उसने अपने काव्य 'पद्मावत' की रचना की थी। यहाँ पर नगर का 'धर्म स्थान' होना कदाचित यह भी सूचित करता है कि जनश्रुति के अनुसार वहाँ उपनिषदकालीन उद्दालक मुनि का कोई आश्रम था। गार्सां द तासी नामक फ़्रेंच लेखक का तो यह भी कहना है कि जायसी को प्राय: 'जायसीदास' के नाम से अभिहित किया जाता रहा है।

जन्म को लेकर मतभेद

जायसी की किसी उपलब्ध रचना के अन्तर्गत उसकी निश्चित जन्म-तिथि अथवा जन्म-संवत का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं पाया जाता। एक स्थल पर वे कहते हैं,

भा आवतार मोर नौ सदी।
तीस बरिख ऊपर कवि बदी।[3]

जिसके आधार पर केवल इतना ही अनुमान किया जा सकता है कि उनका जन्म सम्भवत: 800 हिजरी एवं 900 हिजरी के मध्य, अर्थात सन् 1397 ई॰ और 1494 ई॰ के बीच किसी समय हुआ होगा तथा तीस वर्ष की अवस्था पा चुकने पर उन्होंने काव्य-रचना का प्रारम्भ किया होगा।

परिवार

जायसी के नाम के पहले 'मलिक' उपाधि लगी रहने के कारण कहा जाता है कि उनके पूर्वज ईरान से आये थे और वहीं से उनके नामों के साथ यह ज़मींदार सूचक पदवी लगी आ रही थी किन्तु उनके पूर्वपुरुषों के नामों की कोई तालिका अभी तक प्राप्त नहीं हो सकी है। उनके पिता का नाम मलिक राजे अशरफ़ बताया जाता है और कहा जाता है कि वे मामूली ज़मींदार थे और खेती करते थे। इनके नाना का नाम शेख अल-हदाद खाँ था। स्वयं जायसी को भी खेती करके जीविका-निर्वाह करना प्रसिद्ध है। कुछ लोगों का अनुमान करना कि 'मलिक' शब्द का प्रयोग उनके किसी निकट सम्बन्धी के 'बारह हज़ार का रिसालदार' होने के कारण किया जाता होगा अथवा यह कि सम्भवत: स्वयं भी उन्होंने कुछ समय तक किसी सेना में काम किया होगा, प्रमाणों के अभाव में संदिग्ध हो जाता है। सैयद आले का मत है कि "मोहल्ला गौंरियाना के निगलामी मलिक ख़ानदान से थे" और "उनके पुराने सम्बन्धी मुहल्ला कंचाना में बसे थे।"[4] उन्होंने यह बतलाया है कि जायसी का मलिक कबीर नाम का एक पुत्र भी था। मलिक मुहम्मद जायसी कुरूप और एक आँख से काने थे। कुछ लोग उन्हें बचपन से ही काने मानते हैं जबकि अधिकांश लोगों का मत है कि चेचक के प्रकोप के कारण ये कुरूप हो गये थे और उसी में इनकी एक आँख चली गयी थी। उसी ओर का बायाँ कान भी नाकाम हो गया। अपने काने होने का उल्लेख उन्होंने स्वयं ही किया है :-

एक नयन कवि मुहम्मद गुमी। सोइ बिमोहो जेइ कवि सुनी।। चांद जइस जग विधि ओतारा। दीन्ह कलंक कीन्ह उजियारा।।
जग सुझा एकह नैनाहां। उवा सूक अस नखतन्ह मांहां।। जो लहिं अंबहिं डाभ न होई। तो लाहि सुगंध बसाई न सोई।।
कीन्ह समुद्र पानि जों खारा। तो अति भएउ असुझ अपारा।। जो सुमेरु तिरसूल बिना सा। भा कंचनगिरि लाग अकासा।।
जौं लहि घरी कलंक न परा। कांच होई नहिं कंचन करा।। एक नैन जस दापन, और तेहि निरमल भाऊ। सब रुपवंत पांव जहि, मुख जोबहिं कै चाउ।।
मुहम्मद कवि जो प्रेम या, ना तन रकत न मांस। जेइं मुख देखा तइं हंसा, सुना तो आये आंहु।।

उपर्युक्त पंक्तियों से अनुमान होता है कि बाएँ कान से भी उन्हें कम सुनाई पड़ता था। एक बार जायसी शेरशाह के दरबार में गए, तो बादशाह ने इसका मुँह देखकर हँस दिया। जायसी ने शांत भाव से पूछा -

मोहि कां इससि कि कोहरहि?
अर्थात तू मुझ पर हंसा या उस कुम्हार पर,
इस पर शेरशाह ने लज्जित होकर क्षमा माँगी।[5]

जायसी एक सन्त प्रकृति के गृहस्थी थे। इनके सात पुत्र थे लेकिन दीवार गिर जाने के कारण सभी उसमें दब कर मर गये थे। तभी से इनमें वैराग्य जाग गया और ये फ़कीर बन गये।

शिक्षा

जायसी की शिक्षा भी विधिवत् नहीं हुई थी। जो कुछ भी इन्होनें शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की वह मुसलमान फ़कीरों, गोरखपन्थी और वेदान्ती साधु-सन्तों से ही प्राप्त की थी। [6]

गुरु-परम्परा

जायसी ने अपनी कुछ रचनाओं में अपनी गुरु-परम्परा का भी उल्लेख किया है। उनका कहना है, "सैयद अशरफ, जो एक प्रिय सन्त थे मेरे लिए उज्ज्वल पन्थ के प्रदर्शक बने और उन्होंने प्रेम का दीपक जलाकर मेरा हृदय निर्मल कर दिया। उनका चेला बन जाने पर मैं अपने पाप के खारे समुद्री जल को उन्हीं की नाव द्वारा पार कर गया और मुझे उनकी सहायता से घाट मिल गया, वे जहाँगीर चिश्ती चाँद जैसे निष्कलंक थे, संसार के मखदूम (स्वामी) थे और मैं उन्हीं के घर का सेवक हूँ"।[2] "सैयद अशरफ जहाँगीर चिश्ती के वंश में निर्मल रत्न जैसे हाज़ी हुए तथा उनके अनन्तर शेख मुबारक और शेख कमाल हुए"।[2]

चार मित्रों का वर्णन

जायसी ने 'पद्मावत' (22) में अपने चार मित्रों की चर्चा की है, जिनमें से युसुफ़ मलिक को 'पण्डित और ज्ञानी' कहा है, सालार एवं मियाँ सलोने की युद्ध-प्रियता एवं वीरता का उल्लेख किया है तथा बड़े शेख को भारी सिद्ध कहकर स्मरण किया है और कहा है कि ये चारों मित्र उनसे मिलकर एक चिह्न हो गए थे परन्तु उनके पूर्वजों एवं वंशजों की भाँति इन लोगों का भी कोई प्रमाणिक परिचय उपलब्ध नहीं है।

जायसी का खुद के बारे में कथन

जायसी सैय्यद अशरफ़ को प्यारे पीर मानते हैं और स्वयं को उनके द्वार का मुरीद बताते हैं। उनकी काव्य शैली में --

सो मोरा गुरु तिन्ह हों चला। धोवा पाप पानिसिर मेला।। पेम पियालाया पंथ लखावा। अरपु चाखि मोहिं बूँद चखावा।। जो मधु चढ़ा न उतरइ कावा। परेउ माति पसउं फेरि अरवा।।

एक स्थान पर वो अपने बारे में काफ़ी विनम्र भाव से कहते हैं:-

मुहम्मद मलिक पेम मधुभोरा। नाउँ बड़ेरा दरपन थोरा।। जेव- जेंव बुढ़ा तेवं- तेवं नवा। खुदी कई ख्याल न कवा।। हाथ पियाला साथ सुरांई। पेम पीतिलई आरे निबाही।। बुधि खोई और लाज गँवाई। अजहूँ अइस धरी लरिकाई।। पता न राखा दुहवई आंता। माता कलालिन के रस मांता।। दूध पियसववइ तेस उधारा। बालक होई परातिन्ह बारा।। खउं लाटउं चाहउं खेला। भएउ अजान चार सिर मेला।।
पेम कटोरी नाइके मता पियावइ दूध।
बालक पीया चाहइ, क्या मगर क्या बूध।।

इस पंक्तियों से लगता है कि ये प्रेम- मधु के भ्रमर थे। जायसी संसार को अस्थिर मानते थे, उनके हिसाब से प्रेम और सद्भाव ही स्थिर है या रहेगा, जबकि संसार की तमाम वस्तुएँ अस्थिर है। जायसी ने संसार की अस्थिरता का वर्णन अन्य स्थल पर इस प्रकार किया है --

यह संसार झूठ थिर नाहिं। तरुवर पंखि तार परछाहीं।। मोर मोर कइ रहा न कोई। जाऐ उवा जग अथवा सोई।।
समुद्र तरंग उठै अद्य कूपा। पानी जस बुलबुला होई। फूट बिस्मादि मिलहं जल सोई।। मलिक मुहम्मद पंथी घर ही माहिं उदास। कबहूँ संवरहि मन कै, कवहूँ टपक उबास।।

एक स्थान पर चित्ररेखा में उन्होंने अपने बारे में लिखा है:-

मुहमद सायर दीन दुनि, मुख अंब्रित बेनान। बदन जइस जग चंद सपूरन, एक जइस नेनान।[7]

कृतियाँ

जायसी की 21 रचनाओं के उल्लेख मिलते हैं जिसमें पद्मावत, अखरावट, आख़िरी कलाम, कहरनामा, चित्ररेखा आदि प्रमुख हैं पर उनकी ख्याति का आधार पद्मावत ग्रंथ ही है। इसकी भाषा अवधी है और इसकी रचना शैली पर आदिकाल के जैन कवियों की दोहा चौपाई पद्धति का प्रभाव पड़ा है। 'पद्मावत' का रचनाकाल उन्होंने 147 हिजरी ('सन नौ से सैंतालीस अहै'- पद्मावत 24)। अर्थात 1540 ई॰ बतलाया है। 'पद्मावत' के अन्तिम अंश (653) के आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि उसे लिखते समय तक वे वृद्ध हो चुके थे, "उनका शरीर क्षीण हो गया था, उनकी दृष्टि मन्द पड़ गयी थी, उनके दाँत जाते रहे थे उनके कानों में सुनने की शक्ति नहीं रह गयी थी, सिर झुक गया था, केश श्वेत हो चले थे तथा विचार करने तक की शक्ति क्षीण हो चली थी" किन्तु इसका कोई संकेत नहीं है कि इस समय वे कितने वर्ष की अवस्था तक पहुँच चुके थे। जायसी ने 'आख़िरी कलाम' का रचनाकाल देते समय भी केवल इतना ही कहा है:-

नौ से बरस छतीस जो भए।
तब यह कविता आखर कहे'।[8]

अर्थात् 936 हिजरी अथवा सन् 1529 ई. के आ जाने पर मैने इस काव्य का निर्माण किया। 'पद्मावत' ('पद्मावत' 13-17), में सुल्तान शेरशाह सूर (सन 1540-1545 ई.) तथा 'आख़िरी कलाम'[9] में मुग़ल बादशाह बाबर (सन 1526-1530 ई.) के नाम शाहे वक़्त के रूप में अवश्य लिये हैं और उनकी न्यूनाधिक प्रशंसा भी की है, जिससे सूचित होता है कि वे उनके समकालीन थे। नेरशरीफ़ (ज़िला पटना, बिहार) वाले ख़ानकाह के पुस्तकालय में फ़ारसी अक्षरों में लिखित पुरानी प्रतियों का एक संग्रह मिला है, जिसमें जायसी की 'अखरावत' की भी एक प्रति मिली है। उसमें उसका लिपिकाल जुमा 8 जुल्काद सन् 911 हिजरी अर्थात सन् 1505 ई. दिया गया जान पड़ता है, जो प्रत्यक्षत: पुराना समय है। प्रोफेसर सैयद हसन असकरी का अनुमान है कि वह वस्तुत: 'अखरावट' का रचनाकाल होगा, जो प्रतिलिपि करते समय मूल प्रति से ज्यों का त्यों उद्धृत कर लिया होगा। तदनुसार उनका कहना है कि यदि वह जायसी की सर्वप्रथम रचना सिद्ध की जा सके तो उनके जन्म संवत का पता लगा लेना हमारे लिए असम्भव नहीं रह जाता। सन् 911 हिजरी अर्थात सन् 1505 ई. में उपर्युक्त 30 वर्ष का समय घटाकर सन् 881 हिजरी अर्थात 1475 ई. लाया जा सकता है और यह सरलतापूर्वक बतलाया जा सकता है कि जायसी का जन्म इसके आस-पास हुआ होगा। इन प्रसंग में 910-11 हिजरी के उस प्रचण्ड भूकम्प का भी उल्लेख किया गया है, जिसकी चर्चा अब्दुल्लाह की 'तारीख़ दाऊदी' तथा बदायूनी की 'मुन्तखबुअत्तारीख़' जैसे इतिहास-ग्रन्थों में की गयी है और उसके साथ जायसी द्वारा 'आख़िरी कलाम' (4) में वर्णित भूकम्प की समानता दिखलाकर उपर्युक्त अनुमान की पुष्टि का प्रयत्न भी किया गया है परन्तु यहाँ उपर्युक्त "तीस बरिस ऊपर कवि बदी" के अनन्तर आये हुए "आवत उद्यतभार बड़हाना" के 'आवात' शब्द की ओर कदाचित यथेष्ट ध्यान नहीं दिया गया है। यदि उसका अभिप्राय 'जन्म लेते समय' माना जाये तो उससे ग्रन्थ-रचना के समय का अर्थ नहीं लिया जा सकता। अत: जब तक अन्य स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध न हों, जन्मसम्बन्धी उपर्युक्त धारणा संदिग्ध बनी रहती है। आपकी अनेक रचनाऐं बताई जाती हैं। सर्वसम्मत रचनाएँ निम्नलिखित हैं:-

पद्मावत

यह महाकाव्य जायसी की काव्य-प्रतिभा का सर्वोत्तम प्रतिनिधि है। इसमें चित्तौड़ के राजा रलसेन और सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमकथा वर्णित है। कवि ने कथानक इतिहास से लिया है परन्तु प्रस्तुतीकरण सर्वथा काल्पनिक है। भाव और कला-पक्ष, दोनों ही दृष्टियों से यह एक उत्कृष्ट रचना है। पद्मावत इनका ख्याति का स्थायी स्तम्भ है। पद्मावत मसनवी शैली में रचित एक प्रबंध काव्य है। यह महाकाव्य 57 खंडो में लिखा है। जायसी ने दोनों का मिश्रण किया है। पद्मावत की भाषा अवधी है। चौपाई नामक छंद का प्रयोग इसमे मिलता है। इनकी प्रबंध कुशलता कमाल की है। जायसी के महत्त्व के सम्बन्ध में बाबू गुलाबराय लिखते है:- जायसी महान कवि है ,उनमें कवि के समस्त सहज गुण विद्मान है। उन्होंने सामयिक समस्या के लिए प्रेम की पीर की देन दी। उस पीर को उन्होंने शक्तिशाली महाकाव्य के द्वारा उपस्थित किया । वे अमर कवि है। [10]

अखरावट

अखरावट सृष्टि की रचना को वर्ण्य विषय बनाया गया है। अखरावट के विषय में जायसी ने इसके काल का वर्णन कहीं नहीं किया है। सैय्यद कल्ब मुस्तफा के अनुसार यह जायसी की अंतिम रचना है।

आख़िरी कलाम

'आख़िरी कलाम' ग्रन्थ में इस्लामी मान्यता के अनुसार प्रलय का वर्णन है। जायसी रचित महान ग्रंथ का सर्वप्रथम प्रकाशन फ़ारसी लिपि में हुआ था। इस काव्य में जायसी ने मसनवी- शैली के अनुसार ईश्वर- स्तुति की है।

चित्ररेखा

यह भी एक प्रेमकथा है किन्तु 'पद्मावत' की तुलना में यह एक द्वितीय श्रेणी की रचना है। जायसी ने पद्मावत की ही भांति "चित्ररेखा' की शुरुआत भी संसार के सृजनकर्ता की वंदना के साथ किया है। इसमें जायसी ने सृष्टि की उद्भव की कहानी कहते हुए करतार की प्रशंसा में बहुत कुछ लिखा है। इसके अलावा इसमें उन्होंने पैगम्बर मुहम्मद साहब और उनके चार मित्रों का वर्णन सुंदरता के साथ किया है। इस प्रशंसा के बाद जायसी ने इस काव्य की असल कथा आरंभ किया है।

कहरानामा

कहरानामा का रचना काल 947 हिजरी बताया गया है। यह काव्य ग्रंथ कहरवा या कहार गीत उत्तर प्रदेश की एक लोक- गीत पर आधारित में कवि ने कहरानाम के द्वारा संसार से डोली जाने की बात की है।[11]

इनके अतिरिक्त 'महरी बाईसी' तथा 'मसलानामा' भी आपकी ही रचनाएँ मानी जाती हैं परन्तु जायसी की प्रसिद्धि का आधार तो 'पद्मावत' महाकाव्य ही है।

अन्य कृतियाँ

जायसी की मुख्य कृतियों के अलावा इनकी अतिरिक्त 'मसदा', 'कहरनामा', 'मुकहरानामा' व 'मुखरानामा', 'मुहरानामा', या 'होलीनामा', 'खुर्वानामा', 'संकरानामा', 'चम्पावत', 'मटकावत', 'इतरावत', 'लखरावत', 'मखरावत' या 'सुखरावत' 'लहरावत', 'नैनावात', 'घनावत', 'परमार्थ जायसी' और 'पुसीनामा' रचनाएँ भी जायसी की बतायी जाती हैं। किन्तु इनके विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है।

भाव पक्ष

जायसी रससिद्ध कवि हैं। आपके काव्य का भाव-पक्ष तथा कला-पक्ष दोनों ही समान रूप से प्रभावशाली हैं। आपकी रचनाओं की काव्यगत विशेषताएँ इस प्रकार हैं- जायसी ने भारतीय प्रेमाख्यानों को अपने काव्य का विषय बनाया और उनके माध्यम से आध्यात्मिक रहस्यों को प्रस्तुत किया। 'पद्मावत' काव्य के रूप में एक प्रेम कथा है किन्तु उसमें आत्मा-परमात्मा का मधुर सम्बन्ध तथा सूफी उपासना-पद्धति की विविध मान्यताएँ प्रतीकात्मक रूप में वर्णित हैं। 'पद्मावत' के रूपक-पक्ष को स्वयं कवि ने स्पष्ट किया है-

तन चितउर मन राजा कीन्हा। हिय सिंहल बुधि पद्मिनि चीन्हा॥
गुरु सुआ जेहि पंथ दिखावा। बिन गुरु जगत को निरगुन पावा॥

भारतीय सौन्दर्य-वर्णन की परम्परागत शैली को ही जायसी ने अपनाया है। यह शैली 'नख-शिख वर्णन' कहलाती है। कवि ने पद्मावती के सौन्दर्य-वर्णन में अपने परम्परा-परिचय और मोहक बिम्ब-विधान का परिचय दिया है-

भँवर केस वह मालति रानी। बिसहर लुरहिं लेहिं अरघानी॥

ससि-मुख, अंग मलयगिरि बासा। नागिन झाँपि लीन्ह चहुँ पासा॥

प्रकृति-वर्णन की जायसी के काव्य में कमी है किन्तु वह शृंगार का सहायक होकर आया है। वह स्वतंत्र प्रकृति-चित्रण न होकर रस के उद्दीपन हेतु ही प्रयुक्त हुआ है; यथा

कातिक सरद चंद उजियारी। जग सीतल हौं बिरहै जारी॥
भा बैसाख तपनी अति लागी। चोआ चीर चँदन भा आगी।

आलंकारिक एवं नामपरिगणनात्मक प्रकार का प्रकृति-वर्णन भी 'पद्मावत' में विद्यमान है। जायसी का रहस्यवाद हिन्दी-साहित्य की अमूल्य निधि है। आंचलिक संस्पर्श एवं मानव-मनोविज्ञान के सहयोग से जायसी ने भारतीय नारी का भव्य चित्र उभारा है; यथा-

बरसै मेघ चुवहिं नैनाहा। छपर छपर होइ रहि बिनु नाहा॥
कोरौं कहाँ ठाट नव साजा। तुम बिनु कंत न छाजनि छाजा॥

जायसी सूफी सम्प्रदाय के अनुयायी हैं, जिसमें साधक प्रेम की साधना से ही साध्य को पा सकता है। यही पारलौकिक प्रेम जायसी के ग्रन्थों में लौकिक प्रेम बनकर अवतरित हुआ है। जीवात्मा के ईश्वर से मिलन का यह रूपक, रहस्य-भावना के साथ कवि ने प्रस्तुत किया है। आचार्य शुक्ल के मत में तो शुद्ध रहस्यवाद केवल जायसी के काव्य में ही प्राप्त होता है।

कला पक्ष

जायसी की रचनाओं में विविध रसों का समावेश बड़ी ही सफलता के साथ किया गया है। शृंगार के अतिरिक्त वीर, रौद्र, वीभत्स रसों का मार्मिक चित्रण भी जायसी की कविता में उपलब्ध है।

भाषा

जायसी की भाषा ठेठ अवधी है। उन्होंने उसके व्याकरण सम्मत स्वरूप पर विचार न करके उसमें माधुर्य और मृदुलता के संवर्द्धन पर ही अधिक ध्यान दिया है। यही कारण है कि उसमें व्याकरण-सम्बन्धी अशुद्धियाँ हैं परन्तु श्रुति-माधुर्य और हृदय को छूने की अद्भुत शक्ति है।

शैली

जायसी ने प्रबन्ध शैली को अपने उद्देश्य के अधिक अनुकूल समझा। उन्होंने लोक-प्रचलित भारतीय प्रेमकथाओं का आधार लेकर महाकाव्य की रचना की और साथ ही विदेश मसनव्बी शैली को भी स्थान दिया। काव्य-रचना में आपने आलंकारिक शैली, प्रतीकात्मक शैली, शब्द चित्रात्मक शैली तथा अतिशयोक्ति-प्रधान शैलियों का प्रयोग किया है।

छंद

जायसी ने दोहा-चौपाई, छंदों का प्रयोग किया है। इसी छंद-योजना का चरम विकास तुलसी के 'रामचरितमानस' में प्राप्त होता है।

अलंकार

जायसी ने अलंकारों के प्रयोग में पूर्ण उदारता से काम लिया है। रूप-वर्णन, युद्ध, प्रकृति-चित्रण तथा आध्यात्मिक तत्वों की रहस्य-योजना में अलंकारों की पूरी सहायता ली गई है। आपके प्रिय अलंकारों में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, रूपकातिशयोक्ति आदि का विशेष रूप से प्रयोग हुआ है।

जायसी हिन्दी के प्रथम महाकाव्य के रचयिता हैं। आपकी रसमयी प्रेम-पद्धति हिन्दी काव्य साहित्य की मूल्यवान निधि है। एक साहित्यकार के रूप में तो आप प्रतिष्ठा-प्राप्त हैं ही, आपको साम्प्रदायिक सौमनस्य का संदेश-वाहक भी माना जाना चाहिए।

मृत्यु

मुहम्मद जायसी के जन्म की तरह ही इनकी मृत्यु के भी मतभेद मिले है। सैयद आले मुहम्मद मेहर जायसी ने किसी क़ाज़ी सैयद हुसेन की अपनी नोटबुक में दी गयी जिस तारीख़ '5 रज्जब 949 हिजरी' (सन 1542 ई.) का मलिक मुहम्मद जायसी की मृत्यु तिथि के रूप में उल्लेख किया है[12], उसे भी तब तक स्वीकार नहीं किया जा सकता, जब तक उसका कहीं से समर्थन न हो जाए। कहा जाता है कि इनका देहांत अमेठी के आसपास के जंगलो में हुआ था। अमेठी के राजा ने इनकी समाधी बनवा दी, जो अभी भी है। [10]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 'आख़िरी कलाम' 10
  2. 2.0 2.1 2.2 (‘पद्मावत’) 18, 19, 23
  3. आख़िरी कलाम, 4
  4. ना. प्र. पत्रिका, वर्ष 45, पृष्ठ 49
  5. मलिक मुहम्मद जायसी (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल)। । अभिगमन तिथि: 16 अक्टूबर, 2010
  6. शब्दों का दंगल (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल)। । अभिगमन तिथि: 16 अक्टूबर, 2010
  7. मलिक मुहम्मद जायसी (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल)। । अभिगमन तिथि: 16 अक्टूबर, 2010
  8. आख़िरी कलाम 13
  9. आख़िरी कलाम' 8
  10. 10.0 10.1 हिन्दी कुंज (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल)। । अभिगमन तिथि: 16 अक्टूबर, 2010
  11. कविता कोश (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल)। । अभिगमन तिथि: 16 अक्टूबर, 2010
  12. ना. प्र. पत्रिका, वर्ष 45 पृष्ठ 58

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