शबर  

शबर मीमांसा दर्शन के प्रमुख आचार्य हैं। इन्होंने जैमिनी के सूत्रों पर बृहत भाष्य लिखा है। कहा जाता है कि मीमांसा सूत्रों पर शबर-भाष्य के पूर्व भी कुछ टीकाएं लिखी गई थीं, किन्तु इस समय उनमें से कोई भी टीका उपलब्ध नहीं है।

परिचय

शबर स्वामी के जीवनवृन्त के विषय में कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। कुछ लोग इन्हें ईसा की दूसरी सदी का मानते हैं तो कुछ लोग चौथी सदी का। शबर स्वामी का वास्तविक नाम 'आदित्य देव' था। यह कहा जाता है कि जैनों के भय से वे जंगल में भाग गए थे और वहाँ वेश बदल कर रहने लगे थे। वहीं पर इन्होंने अपना नाम 'शबर' रख लिया। इनका भाष्य 'शबर भाष्य' के नाम से प्रसिद्ध है। इनके स्थान के सम्बन्ध में कोई निश्चित मत नहीं है। पंडित गंगानाथ झा के अनुसार इनका स्थान उत्तर भारत में कश्मीर या तक्षशिला में रहा होगा। शबर भाष्य पर मुख्य तीन मत हो जाते हैं। कुमारिल भट्ट की व्याख्या के आधार पर 'भाट्ट मत' की स्थापना हुई है। प्रभाकर की व्याख्या के आधार पर 'प्रभाकर मत' या 'गुरुमत' स्थापित हुआ है तथा मुरारी मिश्र की व्याख्या पर 'मिश्रमत' स्थापित हुआ है।

दार्शनिक सिद्धान्त

शबर के दार्शनिक सिद्धान्तों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित रूप में दिया जा सकता है-

आत्मा

वेदमंत्रों में कहा गया है कि यज्ञ करने वाला यजमान यज्ञ के पुण्य से स्वर्ग को जाता है। यहाँ पर यह प्रश्न उठाया जाता है कि यज्ञ शरीर से होता है और शरीर यहीं नष्ट हो जाता है। तब स्वर्ग कोन जाता है? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि यह निर्देश शरीर के लिए नहीं है, बल्कि शरीर धारण करने वाली आत्मा के लिए है। यह आत्मा शरीर, इन्द्रिय आदि से भिन्न है। इसका अनुमान श्वास-प्रश्वास आदि क्रियाओं से किया जा सकता है। साथ ही हमें अपने सुख-दु:ख का ही अनुमान होता है और दूसरे के शरीर के रूप-रंग आदि का ज्ञान होता है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि आत्मा जो यज्ञ के पुण्य से स्वर्ग जाता है, शरीर से भिन्न है। इसी प्रकार स्मृति के आधार पर भी यह सिद्ध किया जाता है कि अनुभवव के पश्चात् स्मरण करने वाला आत्मा है और शरीर आदि से भिन्न है, क्योंकि परिवर्तनशील शरीर से स्मरण की व्याख्या सम्भव नहीं है। आत्मा ज्ञान, इच्छा एवं संवेदन आदि का आधार एवं कर्ता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आत्मा का साक्षात् ज्ञान प्राप्त करता है। इसी अर्थ में आत्मा को स्वयं वेद्य कहा जाता है। आत्मा दूसरे के द्वारा साक्षात् रूप में वेद्य नहीं है, किन्तु उपनिषद की नेति-नेति प्रक्रिया के द्वारा इस आत्मा का ज्ञान दूसरे को भी कराया जा सकता है। अपनी आत्मा के साक्षात् ज्ञान के आधार पर दूसरे की आत्मा का अनुमान द्वारा ज्ञान प्राप्त हो सकता है। आत्मा नित्य एवं अविनाशी है। किन्तु इसका सम्बन्ध विनाशी शरीर, इन्द्रिय, धर्म एवं अधर्म अथवा पुण्य और पाप से हो जाता है।

ईश्वर मीमांसा दर्शन में ईश्वर या परमात्मा का निरूपण नहीं है। शबर भाष्य में शब्द तथा अर्थ के सम्बन्ध के विचार के प्रसंग में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि शब्द और अर्थ के सम्बन्ध का कर्ता नहीं है, क्योंकि इस प्रकार के कर्ता की किसी को भी जानकारी नहीं है। यदि कर्ता होता तो उसे भुलाया नहीं जा सकता था। इस कर्ता को सिद्ध करने के लिए अनुमान और अर्थापत्ति आदि प्रमाण भी समर्थ नहीं हैं। अत: शब्द के सम्बन्ध के कर्ता के रूप में ईश्वर को सिद्ध नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर कुमारिल जगत के कर्ता के रूप में भी ईश्वर को नहीं स्वीकार करते। क्योंकि जगत अनादि है, इसकी सृष्टि नहीं हुई है और इसका प्रलय भी संभव नहीं है। अत: सृष्टिकर्ता या प्रलयकर्ता के रूप में भी ईश्वर को सिद्ध नहीं किया जा सकता। वेद की अपौरुषेयता से भी यही सिद्ध होता है कि वेद का कर्ता कोई नित्य सर्वज्ञ ईश्वर नहीं है। वेद नित्य एवं अनादि है, अत: अपौरुषेय है।

पदार्थ

शबर भाष्य में पदार्थों का स्पष्ट निरूपण नहीं किया गया है। पदार्थ के वर्गीकरण में केवल द्रव्य, गुण, कर्म और अवयव की चर्चा की गई है।

प्रमाण

प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति और अभाव में छ: प्रमाण शबर को मान्य हैं।

प्रत्यक्ष

इन्द्रिय का विषय के सम्बन्ध से उत्पन्न होने वाला ज्ञान प्रत्यक्ष है। अत: इसमें धर्म का ज्ञान संभव नहीं है। जो वास्तव में प्रत्यक्ष है, वह कभी ग़लत नहीं हो सकता है और जो ग़लत ज्ञान है, वह कभी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता। अत: बाह्य जगत के सम्बन्ध में ही प्रत्यक्ष प्रमाण है।

अनुमान

शबर के अनुसार व्याप्ति सम्बन्ध पर आधारित वह ज्ञान है, जिसमें एक प्रत्यक्ष वस्तु के आधार पर दूसरी परोक्ष वस्तु का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। यह अनुमान दो प्रकार का होता है। एक साक्षात् प्रत्यक्ष सम्बन्ध के आधार पर और दूसरा सामान्यीकृत प्रत्यक्ष के आधार पर। पहले के उदाहरण के रूप में धूम के द्वारा अग्नि के अनुमान को रखा जा सकता है, जहाँ इन दोनों का व्याप्ति-सम्बन्ध प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होता है। दूसरे के उदाहरण के रूप में हम चन्द्रमा की गति के अनुमान को दे सकते हैं, जो उसके स्थान के परिवर्तन के आधार पर सामान्यीकृत सम्बन्ध के द्वारा प्राप्त किया जाता है।

शब्द

शबर भाष्य में सामान्य शब्द-प्रमाण की चर्चा नहीं है। शब्द प्रमाण में केवल शास्त्र को लिया गया है। शबर के अनुसार शास्त्र या शब्द प्रमाण वह है, जिसके द्वारा अपरोक्ष धर्म-अधर्म का ज्ञान होता है। इस प्रकार शबर भाष्य में शब्द से वैदिक शब्द और अर्थ से धर्म-अधर्म का बोध होता है। शबर शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को नित्य मानते हैं। इनके अनुसार विविध वाक्य धर्म जानने का एकमात्र साधन है। भाष्य में शबर ने विस्तार के साथ शब्द और अर्थ के सम्बन्ध का वर्णन किया है। शब्द अक्षरों के समूह से बनी हुई इकाई है। शब्द के अर्थ के विषय में शबर का मत है कि शब्द के द्वारा सामान्य (जाति) या सामान्य विशेषताओं का बोध होता है, किन्तु व्यवहार में इन विशेषताओं से युक्त व्यक्ति का भी बोध होता है। शब्दार्थ सम्बन्ध संज्ञा-संज्ञी सम्बन्ध है।

उपमान

शबर ने उपमान प्रमाण को सादृश्य के आधार पर होने वाला ज्ञान माना है, जैसे नीलगाय में गाय के सादृश्य से गाय में नीलगाय के सादृश्य का ज्ञान उपमान प्रमाण से होने वाला ज्ञान है।

अर्थापत्ति

जहाँ किसी श्रुत या दुष्ट वस्तु की व्याख्या दूसरे को स्वीकार किए बिना सम्भव न हो, वहाँ दूसरे की स्वीकृति में जिस सहायक प्रमाण की कल्पना की जाए, उसे अर्थापत्ति कहते हैं। जैसे यह कहा जाता है कि जीवित देवदत्त घर में नहीं है। यहाँ देवदत्त का घर में न रहना यह मानने के लिए बाध्य करता है कि देवदत्त घर से बाहर है, क्योंकि इसको माने बिना उक्त कथन (देवदत्त जीवित है और घर में नहीं है) की व्याख्या सम्भव नहीं है।

अभाव

अभाव के द्वारा अनस्तित्व का ज्ञान होता है, जैसे, यह नहीं है। जहाँ उक्त पांचों प्रमाण किसी वस्तु के अस्तित्व को बतलाने में सक्षम नहीं होते, वहाँ हमें उस वस्तु के अभाव या अनस्तित्व का बोध होता है और जिसके द्वारा यह बोध होता रहे उसे ही अभाव कहा जाता है।

धर्म

मीमांसा दर्शन का प्रधान उद्देश्य धर्म की व्याख्या करना है। जैमिनी ने धर्म की परिभाषा देते हुए कहा है 'चोदनालक्षणोऽर्थों धर्म:' अर्थात चोदना के द्वारा लक्षित अर्थ धर्म कहलाता है। 'चोदना' का अर्थ है क्रिया का प्रवर्तक वचन अर्थात् वेद का विधि वाक्य। शबर ने धर्म की व्याख्या विस्तार के साथ की है। इसके अनुसार वेद वाक्यों का मुख्य तात्पर्य विधि का प्रतिपादन ही है। अत: ज्ञान प्रतिपादक वाक्य क्रिया की प्रस्तुति या निषध करने के कारण परस्पर या क्रियापरक हैं। ऐसे वाक्य अर्थवाद वाक्य कहलाते हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि किसी प्रयोजन या उद्देश्य से वेद के द्वारा विहित याग आदि अर्थ धर्म कहलाता है। इन अर्थों के विधिवत् अनुष्ठान करने से पुरुष को स्वर्ग की प्राप्ति होती है, जो समस्त दु:खों को दूर करने वाला नि:श्रेयस है। वेद विहित कर्म ही धर्म है। अत: मीमांसा में इन कर्मों की विशद व्याख्या की गई है।

कर्म के प्रकार

कर्म तीन प्रकार के हैं-

  1. काम्यकर्म - जो किसी कामना के लिए किया जाता है, जैसे- स्वर्ग की कामना से किया जाने वाला यज्ञ कर्म।
  2. प्रतिषिद्ध कर्म - ये वे कर्म हैं, जिन्हें न करने के लिए कहा जाता है, अर्थात जिनके करने से अनर्थ उत्पन्न होता है, जैसे- कलज्जभक्षण। 'कलज्ज' का अर्थ है 'विष से बुझाए गए, शस्त्र से मारे गए पशु का मांस'।
  3. नित्यनैमितिक कर्म - ये वे कर्म हैं, जिनका अनुष्ठान आवश्यक होता है, किन्तु जो किसी लक्ष्य या उद्देश्य के लिए नहीं होते हैं, जैसे- संध्यावंदन इत्यादि नित्य कर्म हैं और किसी अवसर विशेष पर किए जाने वाले श्राद्ध आदि कर्म नैमित्तिक कर्म हैं।

वेद की अपौरूषेयता

यह सिद्धांत रूप में स्वीकार कर लिया गया है कि धर्म के ज्ञान के लिए वेद ही एकमात्र प्रमाणिक एवं विश्वसनीय साधन है। न्याय दर्शन ईश्वर को वेद का रचयिता मानता है। मीमांसा दर्शन का कहना है कि वेद की रचना करने वाला कोई पुरुष (मानव या ईश्वर) नहीं है। यदि इसका रचयिता किसी पुरुष को माना जाये तो रचयिता क अज्ञानी एवं अपूर्ण होने के कारण वेद वाक्यों में त्रुटि और दोष को स्वीकार करना पड़ेगा। यदि रचयिता को नित्य और सर्वज्ञ एवं पूर्ण मान लिया जाए तो दूसरी कठिनाइयाँ उपस्थित होती हैं-

  1. कोई पूर्ण पुरुष, जिसे कोई प्रयोजन नहीं, वेदों की रचना क्यों करेगा।
  2. इस प्रकार के नित्य सर्वज्ञ पुरुष के अस्तित्व में क्या प्रमाण है। इन प्रश्नों का समुचित उत्तर सम्भव नहीं है। इसलिए यही मानना न्यायसंगत है कि वेद किसी पुरुष की रचना नहीं है, बल्कि अपौरूषेय है। अपौरूषेय होने के कारण नित्य एवं स्वयं पर्याप्त हैं। अत: इनमें त्रुटि या दोष का प्रश्न ही नहीं उठता। इस अपौरूषेयत्व की सिद्धि के लिए शबर भाष्य में निम्नलिखित तर्क दिये गए हैं-
  • नित्य, सर्वज्ञ एवं पूर्ण ईश्वर की सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है। अत: उसे वेद का रचयिता नहीं माना जा सकता।
  • जैसे अन्य ग्रन्थों में उसके कर्ता का नाम पाया जाता है, वैसे वेदों में किसी कर्ता का नाम नहीं पाया जाता। कतिपय मंत्रों में ऋषियों के नाम पाये जाते हैं, किन्तु वे उन मंत्रों के द्रष्टा हैं कर्ता नहीं। अत: वेद अपौरूषेय हैं।
  • वेद नित्य हैं, अत: अपौरूषेय हैं।

मौलिक सिद्धांत

वेदों की नित्यता की स्थापना में मीमांसा में अनेक मौलिक सिद्धांत स्वीकार किये गए हैं, जैसे- 'शब्द-नित्यता-वाद' मीमांसा में यह स्थापित किया गया है कि शब्द नित्य है। यह उच्चरित ध्वनियों से भिन्न है। ध्वनियों के उत्पन्न और विनिष्ट होने से शब्द उत्पन्न और विनिष्ट नहीं होता। ध्वनियाँ केवल शब्द को अभिव्यक्त करती हैं। इसी प्रकार अर्थ और शब्दार्थ सम्बन्ध की नित्यता की स्थापना की गई है। शब्द की नित्यता की स्थापना के बाद वाक्य की नित्यता की स्थापना की गई है और वाक्य समूह होने के कारण वेद की नित्यता स्थापित होती है। इस सम्बन्ध में मीमांसाकों की सबसे महत्त्वपूर्ण युक्ति यह है कि शब्द सदा गुरु परम्परा से प्राप्त होता है। वेद भी गुरु परम्परा से ही प्राप्त है। अत: इन्हें श्रुति कहा गया है। वेद की नित्यता की स्थापना के प्रसंग में जगत की अनादिता तथा महाप्रलय के अभाव की भी स्थापना की जाती है। अत: वेद की अपौरूषेयता में अनेक मौलिक सिद्धांतों का समावेश हो जाता है।

देवता

वेदों में अनेक देवताओं, जैसे- इन्द्र, वरुण, रुद्र, विष्णु आदि, का वर्णन है। वेद विहित याग आदि कर्म भी द्रव्य और देवता इन दो वस्तुओं से साध्य होते हैं। द्रव्य, दधि, अक्षत, तिल आदि पदार्थ हैं। मीमांसा के अनुसार देवता शास्त्र के द्वारा वेद्य हैं। देवता के विषय में तीन विकल्प बताये गए हैं-

  1. अर्थ देवता
  2. शब्द विशिष्ट अर्थ देवता
  3. शब्द देवता

इन तीनों विकल्पों का शबर ने युक्ति द्वारा तीसरे विकल्प को सिद्धान्त माना है। उनका कहना है कि शब्द की उपस्थिति प्रथम होती है। अत: प्रथम उपस्थित को देवता मानना युक्तिसंगत है, जैसे- 'इन्द्राय स्वाहा', 'अग्नये स्वाहा' आदि मंत्रों में 'इन्द्राय' एवं 'अग्नेय' ये चतुर्थान्त पद ही देवता है। अर्थ को या शब्द-विशिष्ट अर्थ को देवता मानने वालों को भी शब्द की उपस्थिति स्वीकार करनी पड़ेगी। अत: शब्दमय देवता मानना अधिक संगत प्रतीत होता है। मीमांसा से अन्य आचार्यों ने देवता का विग्रह भी माना है। किन्तु शबर ने देवता-विग्रहवाद का खंडन किया है और शब्दमय देवता के सिद्धांत की स्थापना की है।

वेद

वेद के स्वरूप और विषय के सम्बन्ध में भी मीमांसा का अपना विशिष्ट मत है, जो शबर भाष्य में प्रतिपादित है। मीमांसक वेद से मंत्र और ब्राह्मण दोनों को लेते हैं। स्मृतियाँ भी वेद के अनुगमन करने के कारण प्रमाण रूप में स्वीकृत हैं। विषय की दृष्टि से वेद के पांच विभाग किये गए हैं, जिन्हें- विधि, मंत्र, नामधेय, निषध तथा अर्थवाद कहा जाता है। यों तो वेदों का मुख्य विषय धर्म का प्रतिपादन है और धर्म कर्म रूप हैं, जो केवल विधिवाक्यों की सहायता करने के कारण धर्म प्रतिपादन में सहायक सिद्ध होते हैं।

1. विधि - 'स्वर्ग' की कामना वाला पुरुष यज्ञ करे, इस प्रकार के प्रवर्तना-गर्भित वाक्यों को विधि कहा जाता है। यह विधि चार प्रकार की होती है-

  • (क) उत्पत्ति विधि - कर्म के स्वरूप मात्र को बतलाने वाली विधि है।
  • (ख) विनियोगविधि - वह विधि है जो अंग तथा प्रधान अनुष्ठानों के सम्बन्ध को स्पष्ट करती है।
  • (ग) अधिकार विधि - वह है जो कर्म से उत्पन्न फल के स्वामित्व का बोध कराती है।
  • (घ) प्रयोगविधि - वह है जो प्रयोग की शीघ्रता का बोध कराती है। इन विधियों के निर्धारण के लिए श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान तथा समाख्या आदि प्रमाणों का उपयोग होता है।

2. मंत्र - वेद के वे वाक्य मंत्र कहलाते हैं, जो किसी कर्म का विधान नहीं करते, बल्कि केवल दृढ़ोक्तियों को अभिव्यक्त करते हैं।
3. नामधेय - यज्ञों के नाम तथा अन्य नामों का संकेत करने वाले शब्दों को नामधेय कहा जाता है।
4. निषेध - निषेध करने वाले या किसी कार्य को न करने का आदेश देने वाले वाक्यों को निषध कहते हैं।
5. अर्थवाद - वे वाक्य हैं, जो यज्ञों के फल आदि का निरूपण करते हैं तथा किसी पदार्थ के गुणों एवं दोषों का निरूपण करते हैं।

इस प्रकार वेद के स्वरूप, वेद वाक्यों के प्रकार, उनके अर्थ निर्धारण की प्रक्रिया, उनमें विरोध होने पर उसका निराकरण आदि मीमांसा का प्रमुख विषय है, जिसको शबर ने अपने भाष्य में प्रतिपादित किया है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

विश्व के प्रमुख दार्शनिक |लेखक: डॉक्टर रघुनाथ गिरि |प्रकाशक: वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली, 684 |पृष्ठ संख्या: 592 |


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