नवलखा मन्दिर  

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नवलखा मन्दिर धुमली, काठियावाड़, गुजरात में स्थित है। यह मन्दिर पौराणिक शिल्पकला का एक उत्कृष्ट नमूना है। दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि ये मन्दिर लगभग 200 वर्ष पुराना होगा, किन्तु नजदीक से देखने पर यह बहुत पुराना दिखता है। मान्यता है कि बाबरा नाम के एक भूत ने इस मन्दिर का निर्माण किया था। नवलखा मन्दिर सोमनाथ के ज्योतिलिंग के समान ही बहुत ऊँचा है।

इतिहास

इस मन्दिर को देखकर लगता है कि इसका जीर्णोद्धार भी किया गया था। प्रतीत होता है कि इस मन्दिर को मुस्लिमों ने ध्वंस कर दिया था और बाद में काठी जाति के क्षत्रियों ने इसका पुनरोद्धार करवाया। नवलखा मन्दिर के विषय में मान्यता है कि मन्दिर को बाबरा भूत ने एक ही रात में बनाया था। मन्दिर के चारों ओर नग-अर्द्धनग नवलाख मूर्तियों के शिल्प हैं। सम्पूर्ण मन्दिर 16 कोने वाली नींव के आधार पर निर्मित किया गया है। यह शिव मन्दिर सोलंकी काल में बने प्रमुख महाकाय मन्दिरों में से एक है। नवलखा मन्दिर का जीर्णोद्धार होने से पुराना-मूल भाग आज भी मजबूती के साथ खड़ा है, जबकि नये हिस्से में परिसर छोटा है और आस-पास ऊँचे मकान होने के कारण तसवीर लेना कठिन है।

स्थापत्य कला

धूमली में जो अवशेष प्राप्त हुए हैं, वे 12वीं-13वीं शताब्दी के माने जाते हैं। जेठवा राज्य की पहली राजधानी धूमली पर्वतमाला के बीच में घाटी में स्थित थी। उसके कई खंडहर आज भी मौजूद हैं। जेठवा राज्य के इन मन्दिरों का निर्माण 10वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है। गुजरात का यह मन्दिर 'द्वादश ज्योतिलिंगों' में से एक सोमनाथ मन्दिर की तरह ही काफ़ी ऊँचा है। मन्दिर की छत और गुम्बज के भीतरी हिस्से में जो सुशोभन और नक़्क़ाशी दिखाई देती है, वह अलग-अलग कालखंड की मालूम होती है। मन्दिर के अंदर बड़ा सा सभा-मंडप, गर्भगृह और प्रदक्षिणा पथ अन्य मन्दिरों की भाँति ही है।

इस मन्दिर में प्रवेश के लिए तीन दिशाओं में प्रवेश चौकियाँ हैं। इसकी तीन खिड़कियों से हवा और प्रकाश के कारण पर्यटकों के लिए इस मन्दिर को देखना रोचक अनुभव रहता है। नवलखा मन्दिर की छत का गुम्बज अष्टकोण आकार का है। उसके ऊपर विविध पक्षिओं की आकृति पत्थरों पर उकेरी गई है। इसे पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। सभा मंडप की दोनों मंजिलों के स्तम्भों के उपरी हिस्से को वैविध्यपूर्ण आकार दिया गया है। उसमें ख़ासतौर से मानव मुखाकृति, हाथी की मुखाकृति, मत्स्य युगल, वानर, और कामातुर नारी के शिल्प कलात्मक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

शिल्प

नवलखा मन्दिर के पीछे पीठ क्षेत्र में दो हाथियों का शिल्प है, जिसमें दोनों को अपनी सूंढ के द्वारा आपस में लड़ाई और मस्ती करते हुए चित्रित किया गया है। मन्दिर के बाहरी क्षेत्र में उत्तर दिशा में लक्ष्मी-नारायण, दक्षिण दिशा में ब्रह्मा-सावित्री और पश्चिम में शिव-पार्वती के शिल्प दिखाई देते हैं। मन्दिर के स्थापत्य में भरपूर वैविध्य दिखायी देता है। धूमली में जेठवा साम्राज्य की 10वीं से 12वीं-13वीं शताब्दियों के बीच की समृद्धि को मन्दिर की शिल्पकारी के द्वारा समझा जा सकता है।


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