कोकिलावन  

कोकिलावन अथवा कोलवन नन्दगांव से तीन मील उत्तर और जावट ग्राम से एक मील पश्चिम में स्थित है। यहाँ अभी भी इस सुरक्षित रमणीय वन में मयूर-मयूरी, शुक-सारी, हंस-सारस आदि विविध प्रकार के पक्षी मधुर स्वर से कलरव करते रहते हैं तथा हिरण, नीलगाय आदि पशु भी विचरते हैं। ब्रजवासी लोग झुण्ड के झुण्ड में अपनी गायों को चराते हैं। विशेषत: इस वन में सैकड़ो कोकिलें मीठे स्वर से कुहू-कुहू शब्द के द्वारा वन प्रान्त को गुंजार कर देती हैं। ब्रज के अधिकांश वन नष्ट हो जाने पर भी यह वन कुछ सुरक्षित है। इस वन की प्रदक्षिणा पौने दो कोस की है। ब्रजभूक्ति विलास के अनुसार कोकिलावन में रत्नाकर सरोवर और रासमण्डल अवस्थित हैं।

प्रसंग
एक समय महाकौतुकी श्रीकृष्ण राधिकाजी से मिलने के लिए बड़े उत्कण्ठित थे, किन्तु सास जटिला, ननद कुटिला और पति अभिमन्यु की बाधा के कारण वे इस संकेत स्थल पर नहीं आ सके। बहुत देर तक प्रतीक्षा करने के पश्चात् कृष्ण वहाँ किसी ऊँचे वृक्ष पर चढ़ गये और कोयल के समान बारम्बार मधुर रूप से कुहकने लगे। इस अद्भुत कोकिल के मधुर और ऊँचे स्वर को सुनकर सखियां के साथ राधिका कृष्ण के संकेत को समझ गयीं और उनसे मिलने के लिए अत्यन्त व्याकुल हो उठीं। उस समय जटिला ने विशाखा को सम्बोधित करते हुए कहा- विशाखे! मैंने कोकिलों की मधुर कूक बहुत सुनी है, किन्तु आज तो यह कोयल अद्भु कोयल है। यदि आदेश हो तो हम इस निराली कोकिल को देख आएँ। वृद्धा ने प्रसन्न होकर उन्हें जाने का आदेश दे दिया। सखियाँ बड़ी प्रसन्न हुईं और इस कोकिलावन में प्रवेश किया तथा यहाँ श्रीकृष्ण से मिलकर बड़ी प्रसन्न हुई। इसलिए इसे कोकिला वन कहते हैं। भक्तिरत्नाकर में इसका बड़ा ही सरस वर्णन है

[1]

रत्नाकर कुण्ड

सखियों ने अपने-अपने घरों से दूध लाकर इस सरोवर को प्रकट किया था। इस सरोवर से नाना प्रकार के रत्न निकलते थे, जिससे सखियाँ राधिका जी का श्रृंगार करती थीं।[2] समस्त पापों को क्षय करने वाला तथा धन-धान्य प्रदान करने वाला यह सरोवर भक्तों को श्रीराधाकृष्ण युगल की अहैतुकी भक्ति रूप महारत्न प्रदान करने वाला है।

रास मण्डल

श्रीकृष्ण ने यहाँ गोपियों के साथ रासलीला सम्पन्न की थी तथा रास की समाप्ति के पश्चात् इस कुण्ड में परस्पर जल सिञ्चन आदि क्रीड़ाएँ की थीं ।

आँजनौक

यह अष्टसखियों में से एक विख्यात श्रीविशाखा सखी का निवास-स्थान है। इनके पिता का नाम श्रीपावनगोप और माता का नाम देवदानी गोपी है।[3] नन्दगाँव से पाँच मील पूर्व–दक्षिण कोण में यह अवस्थित है। यहाँ कौतुकी कृष्ण ने अपनी प्राणवल्लभा श्री राधा जी के नेत्रों में अञ्जन लगाया था। इसलिए यह लीला-स्थली आँजनौक नाम से प्रसिद्ध है।

प्रसंग

एक समय राधिका ललिता-विशाखादि सखियों के साथ किसी निर्जन कुञ्ज में बैठकर सखियों के द्वारा वेश-भूषा धारणकर रही थीं। सखियों ने नाना प्रकार के अलंकारों एवं आभूषणों से उन्हें अलंकृत किया। केवल नेत्रों में अञ्जन लगाने जा रही थीं कि उसी समय अचानक कृष्ण ने मधुर बंशी बजाई। कृष्ण की बंशी ध्वनि सुनते ही राधिका उन्मत्त होकर बिना अञ्जन लगाये ही प्राणवल्लभ से मिलने के लिए परम उत्कण्ठित होकर चल दीं। कृष्ण भी उनकी उत्कण्ठा से प्रतीक्षा कर रहे थे। जब वे प्रियतम से मिलीं तो कृष्ण उन्हें पुष्प आसन पर बिठाकर तथा उनके गले में हाथ डालकर सतृष्ण नेत्रों से उनके अंग-प्रत्यंग की शोभा का निरीक्षण करने लगे। परन्तु उनके नेत्रों में अञ्जन न देखकर सखियों से इसका कारण पूछा। सखियों ने उत्तर दिया कि हम लोग इनका श्रृंगार कर रही थीं। प्राय: सभी श्रृंगार हो चुका था, केवल नेत्रों में अञ्जन लगाना बाक़ी था, किन्तु इसी बीच आपकी वंशी की मधुर ध्वनि सुनकर आप से मिलने के लिए अनुरोध करने पर भी बिना एक क्षण रुके चल पड़ीं, ऐसा सुनकर कृष्ण रसावेश में आकर स्वयं अपने हाथों से उनके नेत्रों में अञ्जन लगाकर दर्पण के द्वारा उनकी रूप माधुरी का उनको आस्वादन कराकर स्वयं भी आस्वादन करने लगे। इस लीला के कारण इस स्थान का नाम आँजनौक है यहाँ रासमण्डल है, जहाँ रासलीला हुई थी। गाँव के दक्षिण में किशोरी कुण्ड है। कुण्ड के पश्चिम तट पर अञ्जनी शिला है, जहाँ श्रीकृष्ण ने श्रीराधाजी को बैठाकर अञ्जन लगाया था।[4]

बिजवारी

नन्दगाँव से डेढ़ मील दक्षिण-पूर्व तथा खायरो गाँव से एक मील दक्षिण में यह गाँव स्थित है । इस स्थान का वर्तमान नाम बिजवारी है।

प्रसंग जब अक्रूरजी, बलराम और कृष्ण दोनों भाईयों को मथुरा ले जा रहे थे, तब यहीं पर दोनों भाई रथ पर बैठे। उनके विरह में गोपियाँ व्याकुल होकर एक ही साथ हे प्राणनाथ! ऐसा कहकर मूर्छित होकर भूतल पर गिर गई। उस समय सबको ऐसा प्रतीत हुआ, मानो आकाश से विद्युतपुञ्ज गिर रहा हो। विद्युतपुञ्ज का अपभ्रंश शब्द बिजवारी है। अक्रूरजी दोनों भाईयों को लेकर बिजवारी से पिसाई, साहार तथा जैंत आदि गाँवों से होकर अक्रूर घाट पहुँचे और वहाँ स्नानकर मथुरा पहुँचे थे। बिजवारी और नन्दगाँव के बीच में अक्रूर—स्थान है, जहाँ शिलाखण्ड के ऊपर श्रीकृष्ण के चरण चिह्न हैं।

परसों (पलसों)

रथ पर बैठे हुए श्रीकृष्ण ने गोपियों की विरह दशा से व्याकुल होकर उनको यह संदेश भेजा कि मैं शपथ खाकर कहता हूँ कि परसों यहाँ अवश्य ही लौट आऊँगा। तब से इस गाँव का नाम परसों हो गया। गोवर्धन-बरसाने के रास्ते में यह गाँव स्थित है। सी और परसों दोनों गाँव पास-पास में हैं। 'शीघ्र ही आऊँगा' बार-बार कहा था। इस शीघ्र शब्द से ही इस लीला-स्थली का नाम 'सी' पड़ा है।[5]

कामई

यह अष्टसखियों में प्रमुख सखी विशाखाजी का जन्मस्थान है। यह गाँव बरसाना से पाँच मील तथा उमराव गाँव से साढ़े चार मील दक्षिण-पश्चिम में अवस्थित है। कामई के दक्षिण में सी और परसों गाँव हैं। करेहला ललिताजी का जन्मस्थान है।

करेहला

यह ललिताजी का जन्मस्थान है। करहाला गोपी के पुत्र गोवर्धन मल्ल अपनी पत्नी चन्द्रावली के साथ यहाँ कभी-कभी रहता था। कभी-कभी सखीथरा (सखी-स्थली गोवर्धन के निकट) में रहता था। चन्द्रावली के पिता का नाम चन्द्रभानु गोप और माता का नाम इन्दुमती गोपी था। चन्द्रावली जी राधिका की ज्येष्ठी बहन हैं। वृषभानु महाराज पाँच भाई थे।- वृषभानु, चन्द्रभानु रत्नभानु, सुभानु और श्रीभानु। वृषभानुजी सबसे बड़े थे। राधिका इन्हीं वृषभानुजी की कन्या होने के कारण राधिका और चन्द्रावली दोनों बहनें लगतीं थीं। पद्मा आदि यूथेश्वरियाँ इस स्थान पर रहकर चन्द्रावली से कृष्ण का मिलन कराने के लिए प्रयत्न करती थीं। यहाँ कंकण कुण्ड, कदम्ब खण्डी, झूला, श्रीवल्लभाचार्य, श्रीविट्ठलेश तथा श्रीगोकुलनाथ जी की बैठकें है। यह स्थान कामई से एक मील उत्तर में हैं। भाद्रपूर्णिमा तिथि में बूढ़ीलीला प्रसंग में यहाँ रासलीला होती है।

लुधौली

यह पीसाई गाँव से आधा मील पश्चिम में है। यहाँ पर ललिताजी ने श्रीराधा कृष्ण दोनों का मिलन कराया था। दोनों परस्पर मिलकर यहाँ अत्यन्त लुब्ध हो गये थे। लुब्ध होने के कारण इस स्थान का नाम लुधौली पड़ा। गाँव के बाहर उत्तर में ललिताकुण्ड है, जहाँ दोनों का मिलन हुआ था। कुण्ड के पूर्वी तट पर ललितबिहारी जी का दर्शन है।

पीसाई

गोचारण के समय कृष्ण को प्यास लगने पर बलदेव जी ने जल लाकर उनको पिलाया था इसीलिए इस गाँव का नाम प्यासाई अर्थात् प्यास आई पड़ा है। यहाँ तृष्णा कुण्ड और विशाखा कुण्ड हैं। गाँव के पास ही उत्तर-पश्चिम में मनोहर कदम्ब खण्डी हैं। यह गाँव करेहला से डेढ़ मील उत्तर में स्थित है।

सहार

यह नन्दजी के सबसे बड़े भाई उपानन्द जी का निवास स्थान है। ये परम बुद्धिमान और सब प्रकार से महाराज नन्द के परामर्शदाता थे। ये नन्दनन्दन श्रीकृष्ण को अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे। इन्हीं उपानन्द के पुत्र सुभद्र थे, जिन्हें श्रीकृष्ण अपने सहोदर ज्येष्ठ भ्राता के समान आदर करते थे। सुभद्रा सखा ज्योतिष आदि समस्त कलाओं में पारदर्शी और कृष्ण के प्रति अत्यन्त स्नेहशील थे। ये गोचारण के समय सब प्रकार की विपदाओं से कृष्ण की रक्षा करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते थे। इन्हीं सुभद्र की पत्नी का नाम कुन्दलता है। कृष्ण उनके जीवन सर्वस्य थे। ये बड़ी परिहासप्रिया थीं तथा राधाकृष्ण का परस्पर मिलन कराने में अत्यन्त पटु थीं। यशोदा के आदेश से ये श्रीमती राधिका को जावट से रंधन कार्य के लिए अपने साथ लाती थीं।

साँखी

यह लीलास्थान नरी से एक मील पश्चिम तथा सहार से दो मील उत्तर में है। यहीं पर श्रीकृष्ण ने शंखचूड़ा का बधकर उसके मस्तक से मणि निकाल कर श्री बलदेवजी को दी थी।

प्रसंग

एक दिन गोवर्धन की तलहटी में राधाकुण्ड के निकट सखा मण्डली के साथ कृष्ण तथा सखीमण्डली के साथ राधाजी परस्पर रंगीली होली खेलने में व्यस्त थीं। उसी समय शंखचूड़ नामक असुर गोपियों के पकड़कर ले भागा। श्रीकृष्ण और बलदेव ने शाल के वृक्षों को हाथ में लेकर उसे मारने के लिए पीछा किया। इन दोनों का प्रचण्ड वेग से आते हुए देखकर वह गोपियों को छोड़कर अकेले ही बड़े वेग से भागा, किन्तु कृष्ण ने दाऊ भैया को गोपियों की रक्षा के लिए वहाँ रखकर अकेले ही उसका पीछा किया तथा यहाँ आने पर शंखचूड़ का बंध कर उसके मस्तक से मणि निकाल ली। उन्होंने वह मणि बलदेवजी को दे दी। बलदेवजी ने उस मणि को धनिष्ठा के माध्यम से राधिका के पास भिजवा दिया। राधिकाजी ने उसे बड़े आदर के साथ ग्रहण कर लिया। इसके पास ही रामकुण्ड है। जिसको रामतला भी कहते हैं।

छत्रवन (छाता)

मथुरा दिल्ली राजमार्ग पर मथुरा से लगभग 20 मील उत्तर-पश्चिम तथा पयगाँव से चार मील दक्षिण-पश्चिम में अवस्थित है। छत्रवन का वर्तमान नाम छाता है। गाँव के उत्तर-पूर्व कोने में सूर्यकुण्ड, दक्षिण-पश्चिम कोण में चन्द्रकुण्ड स्थित है। चन्द्रकुण्ड के तट पर दाऊजी का मन्दिर विराजमान है। यहीं पर श्रीदाम आदि सखाओं ने श्रीकृष्ण को सिंहासन पर बैठाकर ब्रज का छत्रपति महाराजा बनाकर एक अभूतपूर्व लीला अभिनय का कौतुक रचा था। श्रीबलरामजी कृष्ण के बाएं बैठकर मन्त्री का कार्य करने लगे। श्रीदाम ने कृष्ण के सिर के ऊपर छत्र धारण किया, अर्जुन चामर ढुलाने लगे, मधुमंगल सामने बैठकर विदूषक का कार्य करने लगे, सुबल ताम्बूल बीटिका देने लगे तथा सुबाहु और विशाल आदि कुछ सखा प्रजा का अभिनय करने लगे। छत्रपति महाराज कृष्ण ने मधुमंगल के माध्यम से सर्वत्र घोषणा करवा दी कि-महाराज छत्रपति नन्दकुमार- यहाँ के एकछत्र राजा हैं। यहाँ अन्य किसी का अधिकार नहीं हैं। गोपियाँ प्रतिदिन मेरे इस बाग़ को नष्ट करती हैं, अत: वे सभी दण्डनीय हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने सखाओं के साथ यह अभिनय लीला कौतुकी क्रीड़ा की थी। इसलिए इस गाँव का नाम छत्रवन या छाता हुआ।

उमराओ

छत्रवन से लगभग चार-पाँच मील पूर्व दिशा में उमराओ गाँव अवस्थित है।

प्रसंग

श्रीकृष्ण की दूहाई सुनकर सखियों ने ललिता के पास कृष्ण के विरुद्ध शिकायत की।[6]ललिताजी ने क्रोधित होकर कहा ऐसा कौन है? जो राधिका के राज्य को अपने अधिकार में कर सकता है। हम इसका प्रतिकार करेंगी। ऐसा कहकर राधिकाजी को एक सुन्दर सिंहासन पर पधारकर उमराव होने की घोषणा की। उमराओ का तात्पर्य राज्य के अधिपति से है। चित्रा सखी ने उनके सिर पर छत्र धारण किया, विशाखा चामर ढुलाने लगी, ललिता जी राधिका के बाँए बैठकर मन्त्री का कार्य करने लगी। कोई सखी उन्हें पान का बीड़ा देने लगी तथा अवशिष्ट सखियाँ प्रजा का अभिनय करने लगीं। राधिकाजी ने सिंहासन पर बैठकर सखियों को आदेश दिया- जाओ, जो मेरे राज्य पर अधिकार करना चाहता है, उसे पराजित कर तथा बाँधकर मेरे सामने उपस्थित करो।[7] उमराव का आदेश पाकर सहस्त्र-सहस्त्र सखियों ने हाथों में पुष्प छड़ी लेकर युद्ध के लिए यात्रा की। अर्जुन, लवंग, भृंग, कोकिल, सुबल और मधुमंगल उन्हें देखकर इधर-उधर भागने लगे, परन्तु किसी चतुर सखी ने मधुमग्ङल को पकड़ लिया और उसे पुष्प माला द्वारा बाँधकर उमराव के चरणों में उपस्थित किया तथा कुछ गोपियाँ मधुमग्ङल को दो- चार गंल्चे भी जड़कर बोलीं- हमारे उमराव के राज्य पर अधिकार करने का इतना साहस? अभी हम तुम्हें दण्ड देती हैं। मधुमंगल पराजित सेनापति की भाँति सिर नीचे कर कहने लगा- ठीक है! हम पराजित हैं, किन्तु दण्ड ऐसा दो कि हमारा पेट भरे। ऐसा सुनकर महारानी राधिका हँसकर बोली- यह कोई पेटू ब्राह्मण है, इसे मुक्त कर दो। सखियों ने उसे पेटभर लड्डू खिलाकर छोड़ दिया। मधुमंगल लौटकर छत्रपति महाराजा कृष्ण को अपने बँध जाने का विवरण सुनाकर रोने का अभिनय करने लगा। ऐसा सुनकर कृष्ण ने मधुमंगल और सखाओं को लेकर उमराओ के ऊपर आक्रमण कर दिया। जब राधिका ने अपने प्राण वल्लभ श्रीकृष्ण को देखा तब बड़ी लज्जित होकर अपने उमराव वेश को दूर करने के लिए चेष्टा करने लगीं। सखियाँ हँसती हुई उन्हें ऐसा करने से रोकने लगीं। मधुमंगल ने छत्रपति बने हुए श्रीकृष्ण को उमराव राधिका के दक्षिण में बैठा दिया। दोनों में संधि हुई तथा कृष्ण ने राधिकाजी का आधिपत्य स्वीकार किया। मधुमंगल ने राधिका के प्रति हाथ जोड़कर कहा- कृष्ण का अंगरूपी राज्य अब तुम्हारे अधिकार में हैं। अब जो चाहो इनसे भेंट ग्रहण कर सकती हो। सारी सखियाँ और सखा इस अभिनय क्रीड़ा-विलास को देखकर बड़े आनन्दित हुय। उमराव लीला के कारण इस गाँव का नाम उमराओ है। यह स्थान राधास्थली के रूप में भी प्रसिद्ध है। तत्पश्चात् पूर्णमासीजी ने यहाँ पर राधिका को ब्रजेश्वरी के रूप में अभिषिक्त किया। यहाँ किशोरी कुण्ड भी है। श्रीलोकनाथ गोस्वामी यहीं पर भजन करते थे। किशोरी कुण्ड से ही श्रीराधाविनोद-विग्रह प्रकट हुए थे। ये श्रीराधाविनोद जी ही लोकनाथ गोस्वामी आराध्यदेव हैं। अब यह श्रीविग्रह जयपुर में विराजमान हैं। उमराओ गाँव के पास ही धनशिंगा गाँव है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. जावटेर पश्चिमे ए वन मनोहर ।
    लक्ष-लक्ष कोकिल कूहरे निरन्तर ।।
    एकदिन कृष्ण एई वनेते आसिया ।
    कोकिल-सदृश शब्द करे हर्ष हईया ।।
    सकल कोकिल हईते शब्द सुमधुर ।
    ये सुने बारेक तार धैर्य जाय दूर ।।
    जटिला कहये विशाखारे प्रियवाणी ।
    कोकिलेर शब्द ऐछे कभु नाहि शुनि ।।
    विशाखा कहये-एई मो सभार मने ।
    यदि कह ए कोकिले देखि गिया वने ।।
    वृद्धा कहे-जाओ ! शुनि उल्लास अशेष ।
    राई सखीसह वने करिला प्रवेश ।।
    हईल महाकौतुक सुखेर सीमा नाई ।
    सकलेई आसिया मिलिला एक ठाँई ।।
    कोकिलेर शब्दे कृष्ण मिले राधिकारे ।
    ए हेतु 'कोकिलावन' कहये इहारे ।।(भक्तिरत्नाकर)
  2. सख्या: क्षीरसमुद्भुत रत्नाकरसरोवरे। नाना प्रकाररत्नानामुद्भवे वरदे नम: ।। नारद पंचरात्र
  3. अञ्जपुरे समाख्याते सुभानुर्गोप: संस्थित:। देवदानीति विख्याता गोपिनी निमिषसुना। तयो: सुता समुत्पन्ना विशाखा नाम विश्रुता ।।
  4. रसेर आवेशे कृष्ण अञ्जन लईया । दिलेन राधिका नेत्रे महा हर्ष हईया
  5. मथुरा हईते शीघ्र करिब गमन। एई हेतु शीघ्र सी, कहये सर्वजन ।। भक्तिरत्नाकर
  6. ललितादि सखी क्रोधे कहे बार बार। राधिकार राज्य के करये अधिकार। ऐछे कत कहि ललितादि सखीगण। राधिकारे उमराओ कैला ईक्षण ।।(भक्तिरत्नाकर
  7. मोर राज्य अधिकार करे येई जन। पराभव करि तारे आन एई क्षण ।। (भक्तिरत्नाकर)

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