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ग्रंथि -सुमित्रानन्दन पंत  

(ग्रंथि (खण्डकाव्य) से पुनर्निर्देशित)
ग्रंथि -सुमित्रानन्दन पंत
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कवि सुमित्रानन्दन पंत
मूल शीर्षक ग्रंथि
कथानक 'ग्रंथि' की कथा चार भागों में बँटी है, जिनका निर्देश प्रत्येक खंड की पहली पंक्ति के प्रथम दो शब्दों से किया गया है।
प्रकाशन तिथि 1920 ई.
देश भारत
भाषा हिन्दी
प्रकार काव्य संकलन
विशेष इस कथानक में भाव चित्रण की ही प्रधानता है और पात्रों का व्यक्तित्व कथा सूत्रों को उभारने में सार्थक है। मिलन की अपेक्षा विरह वर्णन में कवि का मन अधिक रमा है।

ग्रंथि सुमित्रानंदन पंत की प्रारम्भिक रचनाओं में से एक है। इसका प्रकाशन काल 1920 ई. है। इसे प्रेमाख्यानक गीति काव्य कह सकते हैं। स्वयं पंत ने इसे छोटा सा खण्ड काव्य कहा है। यह कहना कठिन है कि इसमें कवि की आत्मानुभूति किस मात्रा में उपयोग में आयी है, क्योंकि स्वयं पंत ने इस रचना पर अपने आकाशवाणी आलेख में उन प्रवादों का प्रतिकार किया है जो इस रचना में व्यक्तिगत पक्ष को लेकर चलते हैं। वे इसे विशुद्ध काव्य प्रयत्न मानते हैं। कालिदास की मेघदूत और अभिज्ञान शाकुंतलम्‌ जैसी रचनाओं से कवि ने अपने काशी प्रवास में जो संस्कार संचित किये थे, उन्हें ही यहाँ उसने कल्पित कथा के सहारे वाणी दी है। ऐसे संदर्भ जैसे नायक की मातृहीनता, मामा द्वारा लालन-पालन आदि कवि की स्वोक्त्ति पर भी खरे उतरते हैं, अत: निर्भ्रांत रूप से कुछ भी कहना असम्भव है। सच तो यह है कि 'ग्रंथि', 'उच्छ्‌वास', 'आँसू' और 'आँसू की बालिका से' शीर्षक रचनाएँ कवि की प्रारम्भिक कृतियों में एक सुनिश्चित शृंखला का निर्माण करती हैं और उनके प्रेम का विप्रलम्भ पक्ष अत्यंत मर्म मधुर बन गया है। उसे कवि की स्वानुभूति ना मानना कठिन है। संकल्पात्मक अनुभूति में उतनी विदग्धता असम्भव है, जितनी इन रचनाओं में दिखायी पड़ती है।

कथानक

'ग्रंथि' की कथा चार भागों में बँटी है, जिनका निर्देश प्रत्येक खंड की पहली पंक्ति के प्रथम दो शब्दों से किया गया है।

प्रथम खंड

प्रथम खंड में कवि कल्पना के प्रति सम्बोधित होकर पूर्वस्मृति को जागृत होने के लिए उसका आवाहन करता है और मधुमास की भूमिका बाँधकर पाठक को अपनी प्रणय गाथा के लिए तैयार करता है। सूर्यास्त के साथ ही नाव ताल में डूब जाती है और नायक जब मूर्च्छा से आँखें खोलता है तो एक कोमल नि:श्वास उसे पुनर्जन्म देता जान पड़्ता है। उसे आभास होता है कि उसका सिर किसी बाला की सुकोमल जाँघ पर टिका है, जिसने कदाचित उसके प्राण बचाये हैं। प्रथम दृष्टि में ही दोनों में प्रेम का संचार हो जाता है और प्रेमी के जिज्ञासा का उत्तर नायिका के मुख से उच्चारित 'नाथ' शब्द की मधुरिमा में झंकृत हो जाता है। प्रथम दर्शन के संकोच, आह्लाद और भाव द्वंद को कवि ने अत्यंत सफलता से अंकित किया है।

दूसरे खंड

दूसरे खंड में नायिका के भाव परिवर्तन को लेकर सखियों की वार्ता उल्लिखित है, जिस पर 'अभिज्ञान शाकुंतलम्‌' विद्यावती की पदावली और रीतिकवियों की भाव मधुरिमा का प्रभाव स्पष्ट रूप से लक्षित होता है। अंत में कवि बतलाता है कि इस प्रकार प्रति दिवस सखियों में हुई प्रेमचर्चा नायिका के भाव जगत् को उकसा कर मधुर बना रही थी। इस भाग को कवि का प्रेमदर्शन कहा जा सकता है जिस पर रोमाट्टिक काव्य की अतींद्रियता और स्वर्गीयता की चाप भी स्पष्ट है।

तीसरे खंड

तीसरे खंड में कवि नायक जीवन के नये मोड़ की सूचना देता है। उसके दुखद बाल जीवन और कठिन किशोर काल की पृष्ठभूमि देकर वह हमें उस घट्ना या दुर्घटना के लिए तैयार करता है जो इस दु:खांतकीय प्रगति का प्राण है। कवि के शब्दों में -

"हाय, मेरे सामने ही प्रणय का,
ग्रंथिबंधन हो गया,
वह नवमधुप सा मेरा हृदय लेकर,
किसी अन्य मानस का विभूषण हो गया।
पाणि, कोमल पाणि।
निज बंधूक की मृदु हथेली में
सरल मेरा हृदय भूल से यदि लेलिया था,
तो मुझे क्यों ना वह लौटा दिया तुमने पुन:?"

इसके पश्चात् कवि बड़ी भावुकता से अपनी आत्मकथा का चित्रण करता है। प्रकृति की विराट मिलनस्थली में एकमात्र वही सब प्रकार अकेला, कंगाल खड़ा है। वह अपने हृदय को धिक्कारता और उस विमोहक सौंदर्य को भी उपालम्भ देने से नहीं चूकता, जिसने इस प्रकार आँखमिचौनी का खेल खेलकर उसके हृदय में घाव कर दिया। अंत में अपनी वेदना को विश्वव्यापी रूप देकर अपने संताप को हल्का करता है- "वेदना! कैसा यह उद्‌गार है। वेदना ही है अखिल ब्रह्माण्ड यह, तुहिन में, तृण में, उपल में, लहर में, तारकों में, व्योम में है वेदना। वेदना! कितना विशद यह रूप है। यह अंधेरे हृदय की दीपक शिखा। रूप की अंतिम छ्टा। औ' विश्व की अदम चरम अवधि, क्षितिज की परिधि सी। अंतिम 'प्रेमवंचित खण्ड' में कवि विरहव्यथित नायक के मनोजगत का चित्रण करता हुआ नियति की दुर्वहता की शिकायत कर कथा का पटाक्षेप करता है और विज्ञ वाचक को आश्वस्त कर विदा लेता है कि छलकती आँखों के शेष आँसूओं को वह फिर कभी उनके कर कमलों में भेंट देगा।

भाव चित्रण

स्पष्ट ही इस कथानक में भाव चित्रण की ही प्रधानता है और पात्रों का व्यक्तित्व कथा सूत्रों को उभारने में सार्थक है। मिलन की अपेक्षा विरह वर्णन में कवि का मन अधिक रमा है। ऐसा जान पड़्ता है कि व:य संधि के हृदय की अंजान आकुलता को वाणी देने के लिए ही कवि ने इस प्रेमकथा की कल्पना कर डाली है। इसी से कथा और पात्र दोनों वायवीय बने रहे हैं, केवल अव्यक्त हृदय पीड़ा ही विप्रयोग के रूप में प्रकट हुई है। स्वयं पंत इस रचना को द्विवेदी युग की काव्य कला का विकास या प्रसार मानते हैं। अत: इसे हम श्रीधर पाठक की रचना 'एकांतवासी योगी' और 'रामनरेश त्रिपाठी' की 'मिलन', पथिक' और 'स्वप्न' कृतियों तथा प्रसाद की 'प्रेमपथिक' कोटि की रचना ही मान सकते हैं। स्वच्छंद और ऐकांतिक किशोर प्रेम का उदात्त और मनोनिष्ठ चित्रण इस रचना की विशेषता है।

भाषा शैली

भाषा और शैली की दृष्टि से यह रचना विशेष महत्त्वपूर्ण है। यद्यपि 'ग्रंथि' की भाषा द्विवेदी युगीन काव्य भाषा के अधिक निकट है और उसमें इतिवृत्तात्मकता का भी पर्याप्त निर्वाह है, परंतु उसमें 'उपमा कालिदासस्य' के आदर्श का निर्वाह करते हुए कवि जिन अनूठी और सरस उपमाओं और उत्प्रेक्षाओं का संचय करता है, वे रचना को एकदम नयी कोटि दे देती हैं। इस भावविदग्ध प्रणय गाथा में अनेक छोटे छोटे स्मृतिखण्ड अँगूठी में नगीने की तरह जड़ गये हैं। बीच में भविष्यत्‌, स्मृति, वेदना आदि के प्रति सम्बोधन काव्य को सम्बोधि गीति की मार्मिकता प्रदान करते हैं। यद्यपि इस रचना में कवि का भावबोध परम्परा से एकदम विच्छिन्न नहीं हुआ है, उसका स्वर स्वीकारी ही बना रहा है, परंतु उसमें काव्य का रसात्मक, कल्पनाप्रवण तथा भाषामधुर स्वरूप काव्यचेतना की ओर ही इंगित करता है। सरस और प्रासादिक भाषा में अतुकांत शैली की यह प्रेमगीति पंत की प्राथमिक कृति होने पर भी अपने में पूर्ण कला सृष्टि है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ


धीरेंद्र, वर्मा “भाग- 2 पर आधारित”, हिंदी साहित्य कोश (हिंदी), 163-164।

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