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जम्मू और कश्मीर रियासत  

जम्मू और कश्मीर भारतीय रियासत थी। यह 1846 से 1947 तक भारत में ब्रिटिश राज के दौरान भी एक रियासत रही। इस रियासत कि स्थापना प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध के बाद हुई, जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने द्वारा सिखों से जीते गये कश्मीर घाटी, जम्मू, लद्दाख और गिलगित-बाल्टिस्तान को 75 लाख रुपये में जम्मू के महाराजा गुलाब सिंह को बेच दिया।

आजाद होता भारत

जब भारत आजाद हो रहा था, तब ब्रिटिश राज ने सभी मौजूदा रियासतों और राजतंत्रों के सामने पेशकश की कि वह भौगोलिक स्थितियों के लिहाज से भारत और पाकिस्तान में से किसी एक में अपना विलय कर लें। तब जम्मू और कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने स्वाधीनता की घोषणा कर दी, यानी उनका कहना था कि 'ना तो हम भारत में जुड़ेंगे और न ही पाकिस्तान में, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान बनाकर रहेंगे।' हालांकि उसके बाद ऐसी स्थितियां पैदा हुईं कि उन्हें कश्मीर का भारत में विलय करना पड़ा। महाराजा हरिसिंह 1925 में कश्मीर की गद्दी पर बैठे थे। वह अपना अधिकांश समय बंबई के रेसकोर्स और अपनी रियासत के बड़े जंगलों में शिकार करते हुए बिताया करते थे। कश्मीर में तब उनके सबसे बड़े विरोधी शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला थे। अब्दुल्ला का जन्म शॉल बेचने वाले एक व्यापारी के घर में हुआ था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एम.एससी. की थी। पढ़ने में कुशाग्र होने के साथ-साथ वह शानदार वक्ता भी थे। उन्हें अपनी बातें तर्कों, तथ्यों के साथ रखनी आती थी।[1]

शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला

शेख अब्दुल्ला ने पहले प्राइवेट स्कूल में अध्यापक की नौकरी की, फिर सियासत में कूद पड़े। उनका कहना था कि इस सूबे में मुसलमानों के साथ भेदभाव वाला सलूक क्यों हो रहा है, बहुसंख्यक होते हुए वह नौकरी और दूसरी बातों में पीछे हैं। 1932 में उन्होंने महाराजा के खिलाफ बढ़ रहे असंतोष को आवाज देने के लिए ऑल जम्मू-कश्मीर मुस्लिम कांफ्रेंस का गठन किया। छह साल के बाद उन्होंने इसका नाम बदलकर नेशनल कॉन्फ्रेंस रख लिया, जिसमें हिंदू और सिक्ख समुदाय के लोग भी शामिल होने लगे। इसी समय शेख़ अब्दुल्ला ने जवाहरलाल नेहरू से भी नजदीकी बढ़ाई। दोनों हिंदू-मुस्लिम एकता और समाजवाद पर एकमत थे। नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस में नजदीकियां होने लगीं। 1940 के दशक में शेख़ अब्दुल्ला कश्मीर के सबसे लोकप्रिय नेता बन चुके थे। कई बार वह जेल में और जेल के बाहर रहे। आजादी से पहले अब्दुल्ला ने कश्मीर में राजतंत्र की जगह प्रजातंत्र लाने के लिए आंदोलन शुरू किया।

हरिसिंह का स्वतंत्र होने का विचार

महाराजा हरिसिंह के मन में स्वतंत्र होने का विचार जड़ें जमा चुका था। वह कांग्रेस को नहीं मानते थे, इसलिए भारत में शामिल होने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। लेकिन अगर वह पाकिस्तान में शामिल हो जाते तो उनके हिंदू राजवंश का सूरज अस्त हो जाता। सितम्बर 1947 के आसपास खबरें मिलने लगीं कि पाकिस्तान बड़ी संख्या में कश्मीर में घुसपैठियों को भेजना चाहता है। इस बीच 25 सितम्बर 1947 को महाराजा ने शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला को जेल से रिहा कर दिया। डोमिनिक लेपियर की किताब "फ्रीडम एट मिडनाइट" कहती है, "जहां तक महाराजा हरिसिंह का सवाल है तो वह अब भी आजाद कश्मीर के ख्वाब में जी रहे थे। 12 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर के उप प्रधानमंत्री ने दिल्ली में कहा कि- "हम भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ दोस्ताना संबंध कायम रखना चाहते हैं। महाराजा की महत्वाकांक्षा कश्मीर को पूरब का स्विट्जरलैंड बनाने की है। एक ऐसा मुुल्क जो बिल्कुल निरपेक्ष होगा।" उन्होंने आगे कहा कि- "केवल एक ही चीज हमारी राय बदल सकती है और वो ये है कि अगर दोनों देशों में कोई भी हमारे खिलाफ शक्ति का इस्तेमाल करता है तो हम अपनी राय पर पुनर्विचार करेंगे।"

कबायलियों का हमला

इन शब्दों के बोले जाने के केवल दो हफ्ते बाद ही हजारों हथियारबंद कबायलियों ने राज्य पर उत्तर दिशा से हमला कर दिया। 22 अक्टूबर को वह उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत और कश्मीर के बीच की सरहद को पार कर गए और तेजी से राजधानी श्रीनगर की ओर बढ़े। इन हमलावरों में ज्यादातर पठान थे, जो उस इलाके से आए थे जो अब पाकिस्तान का हिस्सा बन गया है। इन कबायली विद्रोहियों ने बारामूला में बड़ा उत्पात मचाया। लूटपाट की और महिलाओं और लड़कियों से दुष्कर्म किया।[1]

हरिसिंह की भारत से गुहार

वी. पी. मेनन ने अपनी किताब "पॉलिटिकल इंटीग्रेशन आफ इंडिया" में लिखा, "24 अक्टूबर को महाराजा ने भारत सरकार को सैनिक सहायता का संदेश भेजा। अगले दिन दिल्ली में भारत की सुरक्षा समिति की बैठक हुई। वी. पी. मेनन को जहाज से तुरंत श्रीनगर रवाना किया गया। उन्होंने श्रीनगर में महाराजा से मुलाकात करने के बाद उन्हें हमलावरों से सुरक्षित जम्मू जाने की सलाह दी। नेहरू पाकिस्तान के कबायलियों से मुकाबले के लिए भारतीय सेना को फौरन कश्मीर भेजना चाहते थे। लॉर्ड माउंट बेटन ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया।" उन्होंने महाराजा से पहले विलय के कागजों पर दस्तखत करा लेने को कहा। उनका साफ कहना था कि बिना कानूनी विलय के वह ब्रिटिश अफसरों को भारतीय सेना के साथ नहीं जाने देंगे। 26 अक्टूबर को वी. पी. मेनन को जम्मू में महाराजा के पास फिर से भेजा गया। वहां मेनन से उनसे विलय पत्र पर दस्तखत कराया और दिल्ली आ गए।

जैसे ही ये कानूनी कार्यवाही पूरी हुई। नई दिल्ली ने माउंट बेटन की हिचकिचाहट की परवाह किए बगैर भारतीय सैनिकों से भरे विमान श्रीनगर भेजने शुरू कर दिए, तब तक हमलावर श्रीनगर से कुछ ही दूरी पर रह गए थे। जब भारतीय जवानों का पहला जत्था श्रीनगर हवाई अड्डे पर पहुंचा तो हमलावर हवाई अड्डे की सरहद तक आ पहुंचे थे। अगर कबायलियों ने बारामूला में लूटपाट और औरतों के साथ दुष्कर्म में समय बर्बाद नहीं किया होता तो वो हवाई अड्डे पर कब्जा कर चुके होते और भारतीय विमानों को वहां उतारना मुश्किल हो जाता। इसके बाद भारत ने उरी तक के क्षेत्र से कबायलियों को खदेड़ते हुए इसे अपने कब्जेे में ले लिया। कश्मीर को लेकर दोनों देशों में तनातनी चरम पर थी। ये तब तक जारी रही, जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली संयुक्त सुरक्षा समिति की बैठक में भाग लेने के लिए दिल्ली आए थे। वह और नेहरू इस बात पर सहमत हो गए थे कि पाकिस्तान कबायलियों को लड़ाई बंद करके जल्दी से जल्दी वापस लौटने के लिए कहेगा। भारत भी अपनी ज्यादातर सेनाएं हटा लेगा। संयुक्त राष्ट्र को जनमत संग्रह के लिए एक कमीशन भेजने के लिए कहा जाएगा।

सबसे बड़ी भूल

लॉर्ड माउंट बेटन की सलाह से ही भारत इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले गया था। ये एक बड़ी भूल साबित हुई। बहुत से भारतीय नेता इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि ब्रिटेन पाकिस्तान का साथ देगा। यही हुआ भी। अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर कश्मीर में शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला सरकार को हटाए जाने और जनमत संग्रह होने तक कश्मीर को संयुक्त राष्ट्र के नियंत्रण में लाए जाने की मांग की।[1]

राज्य के संवैधानिक प्रमुख

भारत में विलय के बाद जम्मू और कश्मीर के महाराजा हरीसिंह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक संबंध को लेकर बातचीत की। इसी के तहत राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में बरकरार रहे, लेकिन शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला को आपातकालीन प्रशासक के पद पर नियुक्त कर राज्य में सरकार चलाने की जिम्मेदारी उन्हें दे दी गई। इसके बाद उन्हें 5 मार्च 1948 को राज्य का अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। इसके नतीजे में बाद में संविधान के अंदर अनुच्छेद 370 को जोड़ा गया। आर्टिकल 370 जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार देता है। इसके तुरंत बाद राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने राज्य में 35 ए लगाने की अनुमति दे दी। 1954 में जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान बना। उसके बाद धीरे-धीरे कश्मीर से राजवंश गायब होता चला गया।

पहला चुनाव

1957 में जम्मू-कश्मीर में पहली बार विधानसभा चुनाव हुए। इसमें जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस विजयी रही और पार्टी के नेता बख्शी ग़ुलाम मोहम्मद मुख्यमंत्री बने। 2014 में हुए चुनाव में पीडीपी और भाजपा ने राज्य में गठबंधन सरकार बनाई थी, लेकिन वर्ष 2018 में बीजेपी ने महबूबा मुफ़्ती की सरकार से समर्थन वापस ले लिया। तब से वहां राज्यपाल शासन लागू है।

धारा 370 में बदलाव

भारत में विलय के बाद से कश्मीर को धारा 370 और 35 ए के जरिये जो खास दर्जा मिला हुआ था, उसे केंद्र की एनडीए सरकार ने अनुच्छेद 370 में संशोधन करके काफी कम कर दिया है। हालांकि अनुच्छेद 370 को पूरी तरह हटाया नहीं गया है, बल्कि इसके पहले दो उपबंधों में जिस तरह बदलाव हुआ है, उससे इस राज्य पर केंद्र की पकड़ ना केवल और मजबूत होगी, बल्कि आने वाले समय में यहां कई तरह के संविधान संशोधन करके नियमों में बदलाव का मार्ग भी प्रशस्त हो गया है। सरकार ने अलबत्ता 35 ए को जरूर पूरी तरह से हटा दिया है। इसके साथ ही इस पूरे राज्य को दो हिस्सों में बांटने का फैसला लिया गया है। एक जम्मू और कश्मीर और दूसरा लद्दाख, इसमें जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित विधानसभा रहेगी तो लद्दाख पूरी तरह से केंद्र शासित प्रदेश रहेगा।[1]

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 भारत में विलय के पहले से लेकर आर्टिकल 370 खत्म होने तक ये है जम्मू-कश्मीर की कहानी... (हिंदी) hindi.news18.com। अभिगमन तिथि: 25 मार्च, 2020।

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