पश्चिमी गंग वंश  

पश्चिमी गंग वंश (शासनकाल - 250 से लगभग 1004 ई. तक) प्राचीन कर्नाटक का राजवंश था। ये पूर्वी गंग वंश से अलग थे। पूर्वी गंग वंश ने बाद के वर्षों में ओडिशा पर राज्य किया था। पश्चिमी गंग वंश का मैसूर राज्य (गंगवाड़ी) पर शासन था।

  • भारत में गंग वंश नाम के दो अलग-अलग, लेकिन दूर के संबंधी राजवंश थे-
  1. पश्चिमी गंग वंश (250 से लगभग 1004 ई)
  2. पूर्वी गंग वंश (1028 से 1434-35 ई.)
  • आठवीं शताब्दी के अंत में एक पारिवारिक विवाद ने गंग वंश को कमज़ोर कर दिया था। चोलों के बार-बार आक्रमण ने गंगवाड़ी और उनकी राजधानी के बीच संबंध विच्छेद कर दिया और लगभग 1004 ई. में पश्चिमी गंग वंश का राज्य चोल राजा विष्णुवर्द्धन के क़ब्ज़े में चला गया।
  • पश्चिमी गंग वंश के प्रथम शासक कोंगानिवर्मन, ने अपने विजय अभिमानों से राज्य की स्थापना की, लेकिन उनके उत्तराधिकारियों माधव और हरिवर्मन ने पल्लवों, चालुक्यों और कदंबों के साथ वैवाहिक और सैनिक समझौतों से अपने प्रभाव क्षेत्रों में वृद्धि की।
  • आठवीं शताब्दी के अंत में एक पारिवारिक विवाद ने गंग वंश को कमज़ोर कर दिया, लेकिन बूतुंग द्वितीय (लगभग 937-960) ने तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के बीच व्यापक क्षेत्र पर राज्य क़ायम किया।
  • पश्चिमी गंग वंश के अधिकांश लोग जैन धर्म के अनुयायी थे, लेकिन कुछ लोगों ने ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म को भी प्रश्रय दिया था। उन्होंने कन्नड़ भाषा में विद्वत्तापूर्ण शैक्षिक कार्यो को बढ़ाया दिया, कुछ उल्लेखनीय मंदिर बनवाए, जंगल साफ़ कर खेती योग्य ज़मीन तैयार करवाई और सिंचाई तथा अंतर्प्रायद्वीपीय व्यापार को बढ़ावा दिया।
  • पूर्वी गंग वंश में अंतर्विवाह की शुरुआत हुई और उन्होंने ऐसे समय में चोलों और चालुक्य वंशों को चुनौती देना आरंभ किया, जब पश्चिमी गंग यह सब छोड़ने पर विवश हो चुके थे।
  • बूतुंग द्वितीय के बाद राजमल्ल चतुर्थ और उसके भाई रक्कस क्रमश: राजा हुए। रक्कस के समय 1004 ई. में चोलों ने तलकाड पर अधिकार कर लिया और पश्चिमी गंग वंश का अंत हो गया।




इन्हें भी देखें: गंग वंश


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