महाभारत युद्ध बारहवाँ दिन  

ग्यारहवें दिन के युद्ध में अर्जुन के कारण द्रोणाचार्य युधिष्ठिर को बंदी बना पाने में असफल रहते हैं। इस पर शकुनिदुर्योधन अर्जुन को युधिष्ठिर से काफ़ी दूर भेजने के लिए त्रिगर्त देश के राजा सुशर्मा को उससे युद्ध कर उसे वहीं युद्ध में व्यस्त बनाए रखने को कहते हैं।

  • सुशर्मा दुर्योधन के कहे अनुसार अर्जुन को रणक्षेत्र से बहुत दूर ले जाता है, किन्तु वह अर्जुन को अधिक समय तक रोके नहीं रख सका। शीघ्र ही अर्जुन द्वारा उसका वध हुआ।
  • अर्जुन सुशर्मा का वध कर युधिष्ठिर की ओर लौटने लगे। रास्ते में राजा भगदत्त ने हाथी पर सवार होकर अर्जुन का रास्ता रोक लिया और अपशब्द भी कहे। इस पर अर्जुन ने भगदत्त को मार डाला।
  • इधर द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को पकड़ने की बहुत कोशिश की। सत्यजित, युधिष्ठिर के रक्षक थे। सत्यजित ने द्रोणाचार्य के घोड़े मार दिए तथा रथ के पहिए काट दिए। द्रोणाचार्य ने अर्धचंद्र बाण से सत्यजित का सिर काट दिया। सत्यजित के मरने पर युधिष्ठिर रणक्षेत्र से लौट आए।
  • रात्रि के समय दुर्योधन ने द्रोणाचार्य से कहा कि- "आपकी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई। लगता है पांडवों के प्रति आपका स्नेह है, नहीं तो युधिष्ठिर को पकड़ लेना आपके लिए कोई बड़ी बात नहीं।"[1]
  • दुर्योधन की बात से द्रोणाचार्य क्षोभ से भर उठे। उन्होंने कहा कि- "हमने कोई कसर नहीं उठा रखी, पर अर्जुन अजेय है। कल हम 'चक्रव्यूह' की रचना करेंगे। यदि अर्जुन को दूर ले जाया जाए तो युधिष्ठिर को पकड़ा जा सकता है, क्योंकि चक्रव्यूह का भेद केवल अर्जुन को ही पता है।"


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. द्रोण पर्व महाभारत

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