मीर बाक़ी  

मीर बाक़ी अथवा बाक़ी ताशकंदी (अंग्रेज़ी: Mir Baqi or Baqi Tashqandi) मुग़ल बादशाह बाबर का एक प्रमुख सेनापति था। वह मूल रूप से ताशकंद का निवासी था। माना जाता था कि बाबर ने उसे अवध का शासक यानि गवर्नर बनाया था। बाबरनामा में मीर बाक़ी को 'बाक़ी ताशकंदी' के नाम से भी बुलाया गया है। इसके अलावा उसे 'बाक़ी शाघावाल', 'बाक़ी बेग़' और 'बाक़ी मिंगबाशी' नामों से भी जाना गया है।

परिचय

मीर बाक़ी बाबर का कुशल सेनापति था। माना जाता है कि मीर बाक़ी ने अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद बनाने के लिए उस वक्त की सर्वोत्तम जगह को चुना और रामकोट यानि राम के किले को इस कार्य के लिए चुना। जनश्रुतियों के अनुसार मीर बाक़ी ने मस्जिद बनाने के लिए वहां पहले से मौजूद भगवान राम के मंदिर को तोड़ा था। साल 2003 में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने पाया कि मस्जिद के नीचे एक पुराना खंडहर मौजूद है, जो हिंदू मंदिर से मिलता-जुलता है।

बाबरनामा में मीर बाक़ी को 'मीर' नाम से नहीं पुकारा गया है। अंग्रेज़ सर्वेयर फ्रांसिस बुकानन ने 1813-1814 ई. मेें बाक़ी के नाम के आगे मीर लगाया, जिसका अर्थ राजकुमार होता है। माना जाता है कि इसी मीर बाक़ी ने 1528 ई. में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया था, जो आगे चलकर एक बड़े विवाद का कारण बनी।

सैनिक कमांडर

जनवरी-फ़रवरी 1526 में बाक़ी को शाघावाल नाम से वर्णित किया गया है। उस वक्त बाक़ी को लाहौर के पास दिबलपुर का क्षेत्र दिया गया और बल्ख (अब अफ़ग़ानिस्तान) में एक विद्रोही को वश में करने की जिम्मेदारी दी गई। यहां से वापस आने के बाद बाक़ी को चिन-तिमूर सुल्तान के नेतृत्व में 6-7 हजार सैनिकों का कमांडर बनाया गया। 1528 में इस सेना को एक अभियान पर चंदेरी भेजा गया। यहां से उनके दुश्मन भाग निकले और चिन-तिमूर सुल्तान को उनका पीछा करने का आदेश मिला। जबकि अधीनस्थ कमांडर (बाक़ी) को इससे आगे न जाने का आदेश हुआ। मार्च 1528 ई. में चिन तिमूर सुल्तान के ही नेतृत्व में बयाजिद और बिबन (इब्राहिम लोदी के पूर्व कर्मचारी) को अवध के पास पकड़ने के लिए भेजा गया। इन दोनों ने मुग़ल सेना से लखनऊ का मुग़ल किला छीन लिया और 1529 ई. तक लखनऊ को अपने कब्जे में रखा। मुग़ल सेना की इस हार का ठीकरा बाक़ी के सिर फूटा।

निष्कासन

संभवत: उस वक्त लखनऊ किले की जिम्मेदारी मीर बाक़ी के कंधों पर थी। बाबर हार मानने वाला नहीं था, उसने कुकी और अन्य के नेतृत्व में और सेना भेजी। बयाजिद और बिबन को जब और सेना के आने की भनक लगी तो वे लखनऊ से भाग निकले। लखनऊ किले को कुछ समय के लिए खोना और मीर बाक़ी के उस पर कब्जा न रख पाने की वजह से बादशाह बाबर उससे बहुत नाराज था। इसके बाद 13 जून 1529 को बाबर ने मीर बाक़ी को बुलावा भेजा। 20 जून 1529 को बादशाह ने मीर बाक़ी को अपनी सेना से निकाल दिया। मीर बाक़ी के साथ ही अवध में उसकी सेना को भी बाबर ने निकाल दिया, जिसका वह नेतृत्व करता था। इसके अलावा मीर बाक़ी का जिक्र बाबरनामा में भी नहीं मिलता। फिर अचानक 1813 ई. में बाबरी मस्जिद से मीर बाक़ी का नाम जुड़ जाता है। यह नाम जोड़ा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सर्वेयर फ्रांसिस बुकानन ने।


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