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*निमंत्रित तथा निमंत्रक क्रोध, स्त्रीगमन तथा परिश्रम आदि से दूर रहे।  
 
*निमंत्रित तथा निमंत्रक क्रोध, स्त्रीगमन तथा परिश्रम आदि से दूर रहे।  
 
==पितृ का अर्थ==
 
==पितृ का अर्थ==
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{{Main|पितृ का अर्थ}}
 
'पितृ' का अर्थ है 'पिता', किन्तु 'पितर' शब्द जो दो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है:-
 
'पितृ' का अर्थ है 'पिता', किन्तु 'पितर' शब्द जो दो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है:-
 
#व्यक्ति के आगे के तीन मृत पूर्वज   
 
#व्यक्ति के आगे के तीन मृत पूर्वज   
 
#मानव जाति के प्रारम्भ या प्राचीन पूर्वज जो एक पृथक् लोक के अधिवासी के रूप में कल्पित हैं।<ref>यह दृष्टिकोण यदि भारोपीय (इण्डो यूरोपीयन) नहीं है तो कम से कम भारत पारस्य (इण्डो ईरानियन) तो है ही। प्राचीन पारसी शास्त्र फ्रवशियों (फ्रवशीस=अंग्रेज़ी बहुवचन} के विषय में चर्चा करते हैं, जो आरम्भिक रूप में प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों में प्रयुक्त 'पितृ' या प्राचीन रोमकों (रोमवासियों) का 'मेनस' शब्द है। वे मृत लोगों के अमर एवं अधिष्ठाता [[देवता]] थे। क्रमश: 'फ्रवशी' का अर्थ विस्तृत हो गया और उसमें देवता तथा पृथ्वी एवं आकाश जैसी वस्तुएँ भी सम्मिलित हो गयीं, अर्थात् प्रत्येक में फ्रवशी पाया जाने लगा।</ref>  
 
#मानव जाति के प्रारम्भ या प्राचीन पूर्वज जो एक पृथक् लोक के अधिवासी के रूप में कल्पित हैं।<ref>यह दृष्टिकोण यदि भारोपीय (इण्डो यूरोपीयन) नहीं है तो कम से कम भारत पारस्य (इण्डो ईरानियन) तो है ही। प्राचीन पारसी शास्त्र फ्रवशियों (फ्रवशीस=अंग्रेज़ी बहुवचन} के विषय में चर्चा करते हैं, जो आरम्भिक रूप में प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों में प्रयुक्त 'पितृ' या प्राचीन रोमकों (रोमवासियों) का 'मेनस' शब्द है। वे मृत लोगों के अमर एवं अधिष्ठाता [[देवता]] थे। क्रमश: 'फ्रवशी' का अर्थ विस्तृत हो गया और उसमें देवता तथा पृथ्वी एवं आकाश जैसी वस्तुएँ भी सम्मिलित हो गयीं, अर्थात् प्रत्येक में फ्रवशी पाया जाने लगा।</ref>  
दूसरे अर्थ के लिए [[ऋग्वेद]]<ref>ऋग्वेद (10|14|2 एवं 7; 1015|2 एवं 9|97|39</ref> में उल्लेख है "वह सोम जो कि शक्तिशाली होता चला जाता है और दूसरों को भी शक्तिशाली बनाता है, जो तानने वाले से तान दिया जाता है, जो धारा में बहता है, प्रकाशमान (सूर्य) द्वारा जिसने हमारी रक्षा की – 'वह सोम, जिसकी सहायता से हमारे पितर लोगों ने एक स्थान<ref> जहाँ गायें छिपाकर रखी हुई थीं</ref> को एवं उच्चतर स्थलों को जानते हुए गौओं के लिए पर्वत को पीड़ित किया।" ऋग्वेद<ref>ऋग्वेद (10|15|1</ref> में पितृगण निम्न, मध्यम एवं उच्च तीन श्रेणियों में व्यक्त हुए हैं। वे प्राचीन, पश्चात्यकालीन एवं उच्चतर कहे गये हैं।<ref>[[ऋग्वेद]] 10|15|2</ref> वे सभी अग्नि को ज्ञात हैं, यद्यपि सभी पितृगण अपने वंशजों को ज्ञात नहीं हैं।<ref>ऋग्वेद 10|15|13</ref> वे कई श्रेणियों में विभक्त हैं, यथा–अंगिरस्, वैरूप, भृगु, नवग्व एवं दशग्व<ref>ऋग्वेद (10|14|5-6</ref>; अंगिरस् लोग यम से सम्बन्धित हैं, दोनों को यज्ञ में साथ ही बुलाया जाता है।<ref>ऋग्वेद 10|14|3-5</ref> ऋग्वेद<ref>ऋग्वेद (1|62|2</ref> में ऐसा कहा गया है–"जिसकी (इन्द्र की) सहायता से हमारे प्राचीन पितर अंगिरस्, जिन्होंने उसकी स्तुति-वन्दना की और जो स्थान को जानते थे, गौओं का पता लगा सके।" अंगिरस् पितर लोग स्वयं दो भागों में विभक्त थे; नवग्व एवं दशग्व।<ref>ऋग्वेद 1|62|4; 5|39|12 एवं 10|62|6</ref> कई स्थानों पर पितर लोग सप्त ऋषियों जैसे सम्बोधित किये गये हैं<ref>ऋग्वेद 4|42|8 एवं 6|22|2</ref> और कभी-कभी नवग्व एवं दशग्व भी सप्त ऋषि कहे गये हैं।<ref>ऋग्वेद (1|62|4</ref> अंगिरस् लोग अग्नि<ref>ऋग्वेद 10|62|5</ref> एवं स्वर्ग<ref>ऋग्वेद (4|2|15</ref> के पुत्र कहे गये हैं। पितृ लोग अधिकतर देवों, विशेषत: यम के साथ आनन्द मनाते हुए व्यक्त किये गये हैं।<ref>ऋग्वेद 7|76|4, 10|14|10 एवं 10|15|8-10</ref> वे सोमप्रेमी होते हैं<ref>ऋग्वेद 10|15|1 एवं 5, 9|97|39</ref>, वे कुश पर बैठते हैं<ref>ऋग्वेद 10215|5</ref>, वे अग्नि एवं इन्द्र के साथ आहुतियाँ लेने आते हैं<ref>ऋग्वेद 10|15|10 एवं 10|16|12</ref> और अग्नि उनके पास आहुतियाँ ले जाती हैं।<ref>ऋग्वेद 10|15|12</ref> जल जाने के उपरान्त मृतात्मा को अग्नि पितरों के पास ले जाती है।<ref>ऋग्वेद 10|16|1-2 एवं 5=अथर्ववेद 18|2|10; ऋग्वेद 10|17|3</ref> पश्चात्कालीन ग्रन्थों में भी, यथा [[मार्कण्डेय पुराण]]<ref>मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 45</ref> में [[ब्रह्मा]] को आरम्भ में चार प्रकार की श्रेणियाँ उत्पन्न करते हुए व्यक्त किया गया है, यथा–देव, असुर, पितर एवं मानव प्राणी।<ref> और देखिए ब्रह्मापुराण (प्रक्रिया, अध्याय 8, उपोद्घात, अध्याय 9|10)–'इत्येते पितरो देवा देवाश्च पितर: पुन:। अन्योन्यपितरो होते।'</ref>
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==तपर्ण==
{{बाँयाबक्सा|पाठ=भाद्रपद की प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्ष भर करते हैं। वे चंद्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में अपनी मृत्यु तिथि पर अपने घर के दरवाज़े पर जाते हैं और सम्मान पाकर अपनी नई पीढ़ी को आशीर्वाद देते हैं।|विचारक=}}
 
ऐसा माना गया है कि शरीर के दाह के उपरान्त मृतात्मा को वायव्य शरीर प्राप्त होता है और वह मनुष्यों को एकत्र करने वाले यम एवं पितरों के साथ हो लेता है।<ref>ऋग्वेद 10|14|1 एवं 8, 10|1625)।</ref> मृतात्मा पितृलोक में चला जाता है और अग्नि से प्रार्थना की जाती है कि वह उसे सत् कर्म वाले पितरों एवं विष्णु के पाद-न्यास (विक्रम) की ओर ले जाए।<ref>ऋग्वेद 10|14|9 एवं 10|16|4</ref> यद्यपि ऋग्वेद<ref>ऋग्वेद (10|64|3</ref> में यम की दिवि (स्वर्ग में) निवास करने वाला लिखा गया है, किन्तु निरुक्त<ref>निरुक्त (10|18</ref> के मत से वह मध्यम लोक में रहने वाला देव कहा गया है। [[अथर्ववेद]]<ref>अथर्ववेद (18|2|49</ref> का कथन है–"हम श्रद्धापूर्वक पिता के पिता एवं पितामह की, जो बृहत् मध्यम लोक में रहते हैं और जो पृथ्वी एवं स्वर्ग में रहते हैं, पूजा करें।" ऋग्वेद<ref>ऋग्वेद (1|35|6</ref> में आया है–'तीन लोक हैं; दो (अर्थात् स्वर्ग एवं पृथ्वी) सविता की गोद में हैं, एक (अर्थात् मध्यम लोक) यमलोक है, जहाँ मृतात्मा एकत्र होते हैं।' 'महान प्रकाशमान (सूर्य) उदित हो गया है, (वह) पितरों का दान है।<ref>ऋग्वेद 10|107|1</ref>' [[तैत्तिरीय ब्राह्मण]]<ref>तैत्तिरीय ब्राह्मण (1|2|10|5</ref> में ऐसा आया है कि पितर इससे आगे तीसरे लोक में निवास करते हैं। इसका अर्थ यह है कि भुलोक एवं अंतरिक्ष के उपरान्त पितृलोक आता है। बृहदारण्यकोपनिषद्<ref>बृहदारण्यकोपनिषद् (1|5|16</ref> में मनुष्यों, पितरों एवं देवों के तीन लोक पृथक-पृथक् वर्णित हैं। ऋग्वेद<ref>ऋग्वेद (10|138|1-7</ref> में यम कुछ भिन्न भाषा में उल्लिखित है, वह स्वयं एक देव कहा गया है, न कि प्रथम मनुष्य जिसने मार्ग बनाया<ref>ऋग्वेद 10|14|2</ref>, या वह मनुष्यों को एकत्र करने वाला है<ref>ऋग्वेद (10|14|1</ref> या पितरों की संगति में रहता है। कुछ स्थलों पर वह निसन्देह राजा कहा जाता है और वरुण के साथ ही प्रशंसित है।<ref>ऋग्वेद 10|14|7)।</ref> किन्तु ऐसी स्थिति बहुत ही कम वर्णित है।<ref>इस विषय में अधिक जानकारी के लिए देखिए इस खण्ड का अध्याय 6।</ref>
 
====पितरों की अन्य श्रेणियाँ====
 
[[चित्र:Puran-1.png|250px|thumb|[[पुराण]]]]
 
*पितरों की अन्य श्रेणियाँ भी हैं, यथा–पितर: सोमवन्त:, पितर: बर्हिषद: एवं पितर: अग्निष्वात्ता:।
 
*अन्तिम दो के नाम [[ऋग्वेद]]<ref>ऋग्वेद (10|15|4 एवं 11=तैत्तरीय संहिता 2|6|12|2</ref> में आये हैं। [[शतपथ ब्राह्मण]] ने इनकी परिभाषा यों की है–"जिन्होंने एक सोमयज्ञ किया, वे पितर सोमवन्त: कहे गये हैं; जिन्होंने पक्व आहुतियाँ (चरु एवं पुरोडास के समान) दीं और एक लोक प्राप्त किया, वे पितर बर्हिषद: कहे गये हैं; जिन्होंने इन दोनों में कोई कृत्य नहीं सम्पादित किया और जिन्हें जलाते समय अग्नि ने समाप्त कर दिया, उन्हें अग्निष्वात्ता: कहा गया है; केवल ये ही पितर हैं।"<ref>देखिए तैत्तिरीय ब्राह्मण (1|6|9|5) एवं काठकसंहिता (9|6|17)।</ref>
 
*पाश्चात्कालीन लेखकों ने पितरों की श्रेणियों के नामों के अर्थों में परिवर्तन कर दिया है।
 
*उदाहरणार्थ, नान्दीपुराण (हेमाद्रि) में आया है- ब्राह्मणों के पितर अग्निष्वात्त, क्षत्रियों के पितर बर्हिषद्, वैश्यों के पितर काव्य, शूद्रों के पितर सुकालिन: तथा म्लेच्छों एवं अस्पृश्यों के पितर व्याम हैं।<ref>मिलाइए मनु 3|117)।</ref>
 
*यहाँ तक की मनु<ref>मनु(3|193-198</ref> ने भी पितरों की कई कोटियाँ दी हैं और चारों वर्णों के लिए क्रम से सोमपा:, हविर्भुज:, आज्यपा: एवं सुकालिन: पितरों के नाम बतला दिये गये हैं। आगे चलकर मनु<ref>मनु(3|199</ref> ने कहा है कि ब्राह्मणों के पितर अनग्निदग्ध, अग्निदग्ध, काव्य बर्हिषद्, अग्निष्वात्त एवं सौम्य नामों से पुकारे जाते हैं। इन नामों से पता चलता है कि मनु ने पितरों की कोटियों के विषय में कतिपय परम्पराओं को मान्यता दी है।
 
*इन नामों एवं इनकी परिभाषा के लिए [[मत्स्य पुराण]]<ref>मत्स्य पुराण(141|4, 141|15-18</ref> में भी उल्लेख है।
 
*[[शातातपस्मृति]]<ref>शातातपस्मृति (625-6</ref> में पितरों की 12 कोटियों या विभागों के नाम आये हैं, यथा–पिण्डभाज: (3), लेपभाज: (3), नान्दीमुख (3) एवं अश्रुमुख (3)। यह पितृविभाजन दो दृष्टियों से हुआ है।
 
*[[वायु पुराण]]<ref>वायुपुराण (72|1 एवं 73|6</ref>, [[ब्रह्माण्ड पुराण]]<ref>ब्रह्माण्ड पुराण (उपोदघात् 9|53</ref>, [[पद्म पुराण]]<ref>पद्म पुराण (5|9|2-3</ref>, विष्णुधर्मोत्तर<ref>विष्णुधर्मोत्तर (1|138|2-3</ref> एवं अन्य [[पुराण|पुराणों]] में पितरों के सात प्रकार आये हैं, जिनमें तीन अमूर्तिमान् हैं और चार मूर्तिमान्; वहाँ पर उनका और उनकी संतति का विशद वर्णन हुआ हैं इन पर हम विचार नहीं करेंगे।
 
*[[स्कन्द पुराण]]<ref>स्कन्द पुराण (6|216|9-10</ref> ने पितरों की नौ कोटियाँ दी हैं; अग्निष्वात्ता:, बर्हिषद:, आज्यपात्, सोमपा:, रश्मिपा:, उपहूता:, आयन्तुन:, श्राद्धभुज: एवं नान्दीमुखा:। इस सूची में नये एवं पुराने नाम सम्मिलित हैं।
 
*भारतीय लोग भागों, उपविभागों, विभाजनों आदि में बड़ी अभिरुचि प्रदर्शित करते हैं और सम्भवत: यह उसी भावना का एक दिग्दर्शन है।
 
*मनु<ref>मनु (3|201</ref> ने कहा है कि ऋषियों से पितरों की उदभूति हुई, पितरों से देवों एवं मानवों की तथा देवों से स्थावर एवं जंगम के सम्पूर्ण लोक की उदभूति हुई।
 
*यह द्रष्टव्य है कि यहाँ देवगण पितरों से उदभूत माने गये हैं। यह केवल पितरों की प्रशस्ति है (अर्थात् यह एक अर्थवाद है)।
 
====देवों से भिन्न====
 
पितर लोग देवों से भिन्न थे। [[ऋग्वेद]]<ref>ऋग्वेद (10|53|4</ref> के 'पंचजना मम होत्रं जुषध्वम्' में प्रयुक्त शब्द 'पंचजना:' एवं अन्य वचनों के अर्थ के आधार पर [[ऐतरेय ब्राह्मण]]<ref>[[ऐतरेयब्राह्मण]] (13|7 या 3|31</ref> ने व्याख्या की है वे पाँच कोटियाँ हैं, अप्सराओं के साथ गन्धर्व, पितृ, देव, सर्प एवं राक्षस। निरुक्त ने इसका कुछ अंशों में अनुसरण किया है<ref>निरुक्त (3|8</ref> और अपनी ओर से भी व्याख्या की है। [[अथर्ववेद]]<ref>[[अथर्ववेद]] (10|6|62</ref> में देव, पितृ एवं मनुष्य उसी क्रम में उल्लिखित हैं। प्राचीन वैदिक उक्तियाँ एवं व्यवहार देवों तथा पितरों में स्पष्ट भिन्नता प्रकट करते हैं। तैत्तिरीय संहिता<ref>तैत्तिरीय संहिता (6|1|1|1</ref> में आया है–'देवों एवं मनुष्यों ने दिशाओं को बाँट लिया, देवों ने पूर्व लिया, पितरों ने दक्षिण, मनुष्यों ने पश्चिम एवं रुद्रों ने उत्तर।' सामान्य नियम यह है कि देवों के यज्ञ मध्याह्न के पूर्व में आरम्भ किये जाते हैं और पितृयज्ञ अपरान्ह्न में।<ref>[[शांखायन ब्राह्मण]] 5|6</ref> [[शतपथ ब्राह्मण]]<ref>[[शतपथ ब्राह्मण]](2|4|2|2</ref> ने वर्णन किया है कि पितर लोग अपने दाहिने कंधे पर (और बायें बाहु के नीचे) यज्ञोपवीत धारण करके [[प्रजापति]] के यहाँ पहुँचे, तब प्रजापति ने उनसे कहा- 'तुम लोगों को भोजन प्रत्येक मास (के अन्त) में (अमावस्या को) मिलेगा, तुम्हारी स्वधा विचार की ते­ज़ी होगी एवं चन्द्र तुम्हारा प्रकाश होगा।' देवों से उसने कहा- 'यज्ञ तुम्हारा भोजन होगा एवं सूर्य तुम्हारा प्रकाश।' [[तैत्तिरीय ब्राह्मण]]<ref>तैत्तिरीय ब्राह्मण (1|3|10|4</ref> ने लगता है, उन पितरों में जो देवों के स्वभाव एवं स्थिति के हैं एवं उनमें, जो अधिक या कम मानव के समान हैं, अन्तर बताया है।
 
==देव-कृत्य एवं पितृ कृत्य==
 
[[चित्र:Pitra-Puja-shradh.jpg|thumb|250px|पूजा अर्चना करते श्रद्धालु]]
 
कौशिकसुत्र<ref>कौशिकसुत्र (1|9-23</ref> ने एक स्थल पर देव-कृत्यों एवं पितृ कृत्यों की विधि के अन्तर को बड़े सुन्दर ढंग से दिया है। देव-कृत्य करने वाला यज्ञोपवीत को बायें कंधे एवं दाहिने हाथ के नीचे रखता है एवं पितृ-कृत्य करने वाला दायें कंधे एवं बायें हाथ के नीचे रखता है। देव-कृत्य पूर्व की ओर या उत्तर की ओर मुख करके आरम्भ किया जाता है किन्तु पितृ-यज्ञ दक्षिणाभिमुख होकर आरम्भ किया जाता है। देव-कृत्य का उत्तर-पूर्व (या उत्तर या पूर्व) में अन्त किया जाता है और पितृ-कृत्य दक्षिण-पश्चिम में समाप्त किया जाता है। पितरों के लिए एक कृत्य एक ही बार किया जाता है, किन्तु देवों के लिए कम से कम तीन बार या शास्त्रानुकुल कई बार किया जाता है। [[प्रदक्षिणा]] करने में दक्षिण भाग देवों की ओर किया जाता है और बायाँ भाग पितरों के विषय में किया जाता है। देवों को [[हवि]] या आहुतियाँ देते समय 'स्वाहा' एवं 'वषट्' शब्द उच्चारित होते हैं, किन्तु पितरों के लिए इस विषय में 'स्वधा' या 'नमस्कार' शब्द उच्चारित किया जाता है। पितरों के लिए दर्भ जड़ से उखाड़कर प्रयुक्त होते हैं किन्तु देवों के लिए जड़ के ऊपर काटकर। [[बौधायन श्रौतसूत्र]]<ref>बौधायन श्रौतसूत्र (2|2</ref> ने एक स्थल पर इनमें से कुछ का वर्णन किया है।<ref>प्रागपवर्गाण्युदगपवर्गाणि वा प्राडमुख: प्रदक्षिणं यज्ञोपवीती दैवानि कर्माणि करोति। दक्षिणा मुख: प्रसव्यं प्राचीनावीती पित्र्याणि। बौधायन श्रौतसूत्र (2|2</ref> स्वयं ॠग्वेद<ref>ऋग्वेद (10|14|3 'स्वाहयान्ये स्वधयान्ये मदन्ति'</ref> ने देवों एवं पितरों के लिए ऐसे शब्दान्तर को व्यक्त किया है। [[शतपथब्राह्मण]]<ref>शतपथब्राह्मण (2|1|3|4 एवं 2|1|4|9</ref> ने देवों को अमर एवं पितरों को मर कहा है।
 
====देव एवं पितर की पृथक कोटियाँ====
 
यद्यपि देव एवं पितर पृथक् कोटियों में रखे गये हैं, तथापि पितर लोग देवों की कुछ विशेषताओं को अपने में रखते हैं। [[ऋग्वेद]]<ref>ऋग्वेद (10|15|8</ref> ने कहा है कि पितर सोम पीते हैं। ऋग्वेद<ref>ऋग्वेद (10|68|11</ref> में ऐसा कहा गया है कि पितरों ने [[आकाश]] को [[नक्षत्र|नक्षत्रों]] से सुशोभित किया (नक्षत्रेभि: पितरो द्यामपिंशन्) और अंधकार रात्रि में एवं प्रकाश दिन में रखा। पितरों को गुप्त प्रकाश प्राप्त करने वाले कहा गया है और उन्हें 'उषा' को उत्पन्न करने वाले द्योतित किया गया है।<ref>ऋग्वेद 7|76|3</ref> यहाँ पितरों को उच्चतम देवों की शक्तियों से समन्वित माना गया है। भाँति-भाँति के वरदानों की प्राप्ति के लिए पितरों को श्रद्धापूर्वक बुलाया गया है और उनका अनुग्रह कई प्रकार से प्राप्य कहा गया है।<ref>ऋग्वेद (10|14|6</ref> में पितरों से सुमति एवं सौमनस (अनुग्रह) प्राप्त करने की बात कही गयी है। उनसे कष्टरहित आनन्द देने<ref>ऋग्वेद 10|15|4</ref> एवं यजमान (यज्ञकर्ता) को एवं उसके पुत्र को सम्पत्ति देने के लिए प्रार्थना की गयी है।<ref>ऋग्वेद 10|15|7 एवं11</ref> [[ऋग्वेद]]<ref>ऋग्वेद (10|15|11</ref> एवं [[अथर्ववेद]]<ref>अथर्ववेद (18|3|14</ref> ने सम्पत्ति एवं शूर पुत्र देने को कहा है। अथर्ववेद<ref>अथर्ववेद (14|2|73</ref> ने कहा है–'वे पितर जो वधु को देखने के लिए एकत्र होते हैं, उसे सन्ततियुक्त आनन्द दें।' वाजसनेयी संहिता<ref>वाजसनेयी संहिता (2|33</ref> में प्रसिद्ध मंत्र यह है–"हे पितरो, (इस पत्नी के) गर्भ में (आगे चलकर) कमलों की माला पहनने वाला बच्चा रखो, जिससे वह कुमार (पूर्ण विकसित) हो जाए", जो इस समय कहा जाता है, जब कि श्राद्धकर्ता की पत्नी तीन पिण्डों में बीच का पिण्ड खा लेती है।<ref>आधत्त पितरो गर्भ कुमारं पुष्करस्रजम्। यथेह पुरुषोऽसत्।। वाज. सं. (2|33)। खादिरगृह्य. (3|5|30) ने व्यवस्था दी है–'मध्यमं पिण्डं पुत्रकामा प्राशयेदाधत्तेति'; और देखिए गोभिलगृह्य (4|3|27) एवं कौशिकसूत्र (89|6)। आश्वलायन श्रौतसूत्र (2|7|13) में आया है–'पत्नीं प्राशयेदाधत्त पितरो....स्रजम्।' अश्विनौ को पुष्करस्रजौ कहा गया है, अत: 'पुष्करस्रज' शब्द में भावना यह है की पुत्र लम्बी आयु वाला एवं सुन्दर हो। 'यथेह....असत्' को इस प्रकार व्याख्यायित किया गया है–'येन प्रकारेण इहैव क्षितौ पुरुषो देवपितृमनुष्याणमभीष्टपूरयिता भूपात् तथा गर्भमाधत्त।' देखिए हलायुध का ब्राह्मणसर्वस्व। कात्यायन श्रौतसूत्र (4|1|22) ने भी कहा है–'आधत्तेति मध्यमपिण्डं पत्नी प्राश्नाति पुत्रकामा।</ref>
 
====मूल एवं प्रकार====
 
[[वैदिक साहित्य]] के उपरान्त की रचना में, विशेषत: [[पुराण|पुराणों]] में पितरों के मूल एवं प्रकारों के विषय में विशद वर्णन मिलता है। उदाहरणार्थ, [[वायुपुराण]]<ref>वायुपुराण (56|18</ref> ने पितरों की तीन कोटियाँ बताई हैं; काव्य, बर्हिषद एवं अग्निष्वात्त्। पुन: वायु पुराण<ref>वायुपुराण(अध्याय 73</ref> ने तथा [[वराह पुराण]]<ref>[[वराह पुराण]] (13|16</ref>, [[पद्म पुराण]]<ref>पद्म पुराण (सृष्टि 9|2-4</ref> एवं ब्रह्मण्ड पुराण<ref>ब्रह्मण्ड पुराण (3|10|1</ref> ने सात प्रकार के पितरों के मूल पर प्रकाश डाला है, जो कि स्वर्ग में रहते हैं, जिनमें चार तो मूर्तिमान् हैं और तीन अमूर्तिमान्। शतातपस्मृति<ref>शतातपस्मृति (6|5|6</ref> ने 12 पितरों के नाम दिये हैं; पिण्डभाज:, लेपभाज:, नान्दीमुखा: एवं अश्रुमुखा:।
 
====भय-तत्त्व====
 
इन शब्दों से यह नहीं समझना चाहिए कि पितरों के प्रति लोगों में भय-तत्त्व का सर्वथा अभाव था।<ref>मिलाइए वुलियामीकृत 'इम्मॉर्टल मैन' (पृष्ठ 24-25), जहाँ आदिम अवस्था एवं सुसंस्कृत काल के लोगों के मृतक सम्बन्धी भय स्नेह के भावों के विषय में प्रकाश डाला गया है।</ref> उदाहरणार्थ ॠग्वेद<ref>ऋग्वेद (10|15|6</ref> में आया है–'(त्रुटि करने वाले) मनुष्य होने के नाते यदि हम आप के प्रति कोई अपराध करें तो हमें उसके लिए दण्डित न करें।' ॠग्वेद<ref>ऋग्वेद (3|55|2</ref> में हम पढ़ते हैं–"वे देव एवं प्राचीन पितर, जो इस स्थल (गौओं या मार्ग) को जानते हैं, हमें यहाँ हानि न पहुँचायें।" ॠग्वेद<ref>ऋग्वेद (10|66214</ref> में ऐसा आया है कि–'वसिष्ठों ने देवों की स्तुति करते हुए पितरों एवं ऋषियों के सदृश वाणी (मंत्र) परिमार्जित की या गढ़ी।" यहाँ पितृ एवं ऋषि दो पृथक् कोटियाँ हैं और वसिष्ठों की तुलना दोनों से की गई है।<ref><poem>देवा: सौम्याश्च काव्याश्च अयज्वानो ह्ययोनिजा:।
 
देवास्ते पितर: सर्वे देवास्तान्वादयन्त्युत।।
 
मनुष्यपित रश्चैव तेभ्योऽन्ये लौकिका: स्मृता:।
 
पिता पितामहश्चैव तथा य: प्रपितामह:।। [[ब्रह्माण्ड पुराण]] (2|28|70-71);
 
अंगीराश्च ऋतुश्चैव कश्यपश्च महानृषि:।
 
एते कुरुकुलश्रेष्ठ महायेगेश्वरा: स्मृता।।
 
एते च पितरो राजन्नेष श्राद्धविधि: पर:।
 
प्रेतास्तु पिण्डसम्बन्धान्मुच्यन्ते तेन कर्मणा। [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]] (92|21-22)।
 
इस उद्धरण से प्रकट होता है कि अंगिरा, ऋतु एवं कश्यप पितर हैं, जिन्हें जल दिया जाता है (पिण्ड नहीं), किन्तु समीपवर्ती मृत पूर्वजों को पिण्ड दिये जाते हैं।</poem></ref>
 
====आवाहन====
 
[[वैदिक साहित्य]] की बहुत सी उक्तियों में पितर शब्द व्यक्ति के समीपवर्ती, मृत पुरुष पूर्वजों के लिए प्रयुक्त हुआ है। अत: तीन पीढ़ियों तक वे (पूर्वजों को) नाम से विशिष्ट रूप से व्यंजित करते हैं, क्योंकि ऐसे बहुत से पितर हैं, जिन्हें आहुति दी जाती है।'<ref>[[तैत्तिरीय ब्राह्मण]] 1|6|9|5</ref> [[शतपथ ब्राह्मण]]<ref>शतपथ ब्राह्मण (2|4|2|19</ref> ने पिता, पितामह एवं प्रपितामह को पुरोडाश (रोटी) देते समय के सूक्तों का उल्लेख किया है और कहा है कि कर्ता इन शब्दों को कहता है–"हे पितर लोग, यहाँ आकर आनन्द लो, बैलों के समान अपने-अपने भाग पर स्वयं आओ'।<ref>वाज. सं. 2|31, प्रथम पाद</ref> कुछ<ref>तैत्तिरीय संहिता 1|8|5|1</ref> ने यह सूक्त दिया है–"यह (भात का पिण्ड) तुम्हारे लिये और उनके लिये है जो तुम्हारे पीछे आते हैं।" किन्तु शतपथ ब्राह्मण ने दृढ़तापूर्वक कहा है कि यह सूक्त नहीं करना चाहिए, प्रत्युत यह विधि अपनानी चाहिए–"यहाँ यह तुम्हारे लिये है।" [[शतपथ ब्राह्मण|शतपथब्राह्मण]]<ref>शतपथब्राह्मण (12|8|1|7</ref> में तीन पूर्व पुरुषों को स्वधाप्रेमी कहा गया है। इन वैदिक उक्तियों एवं मनु<ref>मनु (3|221</ref> तथा [[विष्णु पुराण]]<ref>[[विष्णु पुराण]] (21|3 एवं 75|4</ref> की इस व्यवस्था पर कि नाम एवं गोत्र बोलकर ही पितरों का आवाहन करना चाहिए, निर्भर रहते हुए श्राद्धप्रकाश<ref>पृष्ठ 12</ref> ने यह निष्कर्ष निकाला है कि पिता एवं अन्य पूर्वजों को ही श्राद्ध का देवता कहा जाता है, न कि वसु, रुद्र एवं आदित्य को, क्योंकि इनके गोत्र नहीं होते और पिता आदि वसु, रुद्र एवं आदित्य के रूप में कवल ध्यान के लिए वर्णित हैं। श्राद्धप्रकाश<ref>श्राद्धप्रकाश (पृष्ठ 204</ref> [[ब्रह्म पुराण]] ने इस कथन, जो यह व्यवस्था देता है कि कर्ता को ब्राह्मणों से यह कहना चाहिए की मैं कृत्यों के लिए पितरों को बुलाऊँगा और जब ब्राह्मण ऐसी अनुमति दे देते हैं, तो उसे वैसा करना चाहिए, (अर्थात् पितरों का आहावान करना चाहिए), यह निर्देश देता है कि यहाँ पर पितरों का तात्पर्य है देवों से, अर्थात् वसुओं, रुद्रों एवं आदित्यों से तथा मानवों से, यथा–कर्ता के पिता एवं अन्यों से। [[वायु पुराण]]<ref>वायु पुराण (56|65-66</ref>, [[ब्रह्माण्ड पुराण]] एवं अनुशासन पर्व ने उपर्युक्त पितरों एवं लौकिक पितरों ([[पिता]], पितामह एवं प्रपितामह) में अन्दर दर्शाया हैं।<ref>देखिए वायु पुराण (70|34), यहाँ पितर लोग देवता कहे गये हैं।</ref>
 
====तपर्ण====
 
 
[[चित्र:Pitra-paksh-Shradh.jpg|thumb|250px|पूजा अर्चना करते श्रद्धालु]]
 
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सूत्रकाल (लगभग ई. पू. 600) से लेकर [[मध्यकाल]] के धर्मशास्त्रकारों तक सभी लोगों ने श्राद्ध की महत्ता एवं उससे उत्पन्न कल्याण की प्रशंसा के पुल बाँध दिये हैं। [[आपस्तम्ब धर्मसूत्र]]<ref>आपस्तम्ब धर्मसूत्र (2|7|16|1-3</ref> ने अधोलिखित सूचना दी है- 'पुराने काल में मनुष्य एवं देव इसी लोक में रहते थे। देव लोग यज्ञों के कारण (पुरस्कारस्वरूप) स्वर्ग चले गये, किन्तु मनुष्य यहीं पर रह गये। जो मनुष्य देवों के समान यज्ञ करते हैं वे परलोक (स्वर्ग) में देवों एवं [[ब्रह्मा]] के साथ निवास करते हैं। तब (मनुष्यों को पीछे रहते देखकर) मनु ने उस कृत्य को आरम्भ किया जिसे श्राद्ध की संज्ञा मिली है, जो मानव जाति को श्रेय (मुक्ति या आनन्द) की ओर ले जाता है। इस कृत्य में पितर लोग देवता (अधिष्ठाता) हैं, किन्तु ब्राह्मण लोग (जिन्हें भोजन दिया जाता है) आहवानीय अग्नि (जिसमें [[यज्ञ|यज्ञों]] के समय आहुतियाँ दी जाती हैं) के स्थान पर माने जाते हैं।"  
 
सूत्रकाल (लगभग ई. पू. 600) से लेकर [[मध्यकाल]] के धर्मशास्त्रकारों तक सभी लोगों ने श्राद्ध की महत्ता एवं उससे उत्पन्न कल्याण की प्रशंसा के पुल बाँध दिये हैं। [[आपस्तम्ब धर्मसूत्र]]<ref>आपस्तम्ब धर्मसूत्र (2|7|16|1-3</ref> ने अधोलिखित सूचना दी है- 'पुराने काल में मनुष्य एवं देव इसी लोक में रहते थे। देव लोग यज्ञों के कारण (पुरस्कारस्वरूप) स्वर्ग चले गये, किन्तु मनुष्य यहीं पर रह गये। जो मनुष्य देवों के समान यज्ञ करते हैं वे परलोक (स्वर्ग) में देवों एवं [[ब्रह्मा]] के साथ निवास करते हैं। तब (मनुष्यों को पीछे रहते देखकर) मनु ने उस कृत्य को आरम्भ किया जिसे श्राद्ध की संज्ञा मिली है, जो मानव जाति को श्रेय (मुक्ति या आनन्द) की ओर ले जाता है। इस कृत्य में पितर लोग देवता (अधिष्ठाता) हैं, किन्तु ब्राह्मण लोग (जिन्हें भोजन दिया जाता है) आहवानीय अग्नि (जिसमें [[यज्ञ|यज्ञों]] के समय आहुतियाँ दी जाती हैं) के स्थान पर माने जाते हैं।"  
====श्राद्ध की प्रशस्तियाँ====
 
श्राद्ध की प्रशस्तियों के कुछ उदाहरण यहाँ दिये जा रहे हैं। [[बौधायन धर्मसूत्र]]<ref>[[बौधायन धर्मसूत्र]] (2|8|1</ref> का कथन है कि पितरों के कृत्यों से दीर्घ आयु, स्वर्ग, यश एवं पुष्टिकर्म (समृद्धि) की प्राप्ति होती है। [[हरिवंश पुराण]]<ref>हरिवंश (1|21|1</ref> में आया है–श्राद्ध से यह लोक प्रतिष्ठित है और इससे योग (मोक्ष) का उदय होता है। सुमन्तु<ref>स्मृतिच., श्राद्ध, पृष्ठ 333</ref> का कथन है–श्राद्ध से बढ़कर श्रेयस्कर कुछ नहीं है।<ref>पित्र्यमायुष्यं स्वर्ग्य यशस्यं पुष्टकिर्म च। बौधायन धर्मसूत्र (2|8|1) श्राद्धे प्रतिष्ठितो लोक: श्राद्धे योग: प्रवर्तते।। हरिवंश (1|21|11)। श्राद्धत्परतरं नान्यच्छ्रेयस्करमुदाह्रतम्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं कुर्याद्विचक्षण:।। सुमन्तु (स्मृतिच., श्राद्ध, 333)।</ref> [[वायुपुराण]]<ref>[[वायुपुराण]] (3|14|1-4</ref> का कथन है कि यदि कोई श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है तो वह [[ब्रह्मा]], [[इन्द्र]], [[रुद्र]] एवं अन्य देवों, ऋषियों, पक्षियों, मानवों, पशुओं, रेंगने वाले जीवों एवं पितरों के समुदाय तथा उन सभी को जो जीव कहे जाते हैं, एवं सम्पूर्ण विश्व को प्रसन्न करता है। यम ने कहा है कि पितृपूजन से आयु, पुत्र, यश, कीर्ति, पुष्टि (समृद्धि), बल, श्री, पशु, सौख्य, धन, धान्य की प्राप्ति होती है।<ref>आयु: पुत्रान् यश: स्वर्ग कीर्ति पुष्टिं बलं श्रिय:। पशुन् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।। यम (स्मृतिच., श्राद्ध, पृष्ठ 333 एवं श्राद्धसार पृष्ठ 5)। ऐसा ही श्लोक याज्ञ. (1|270, मार्कण्डपुराण 32|38) एवं शंख (14|33) में भी है। और देखिए याज्ञ. (1|270)।</ref> श्राद्धसार<ref>श्राद्धसार (पृष्ठ 6</ref> एवं श्राद्धप्रकाश<ref>श्राद्धप्रकाश (पृष्ठ 11-12</ref> द्वारा उदधृत विष्णुधर्मोत्तरपुराण में ऐसा कहा गया है कि प्रपितामह को दिया गया पिण्ड स्वयं वासुदेव घोषित है, पितामह को दिया गया पिण्ड संकर्षण तथा पिता को दिया गया पिण्ड प्रद्युम्न घोषित है और पिण्डकर्ता स्वयं अनिरुद्ध कहलाता है। [[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]]<ref>[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]] (345|21</ref> में कहा गया है कि विष्णु को तीनों पिण्डों में अवस्थित समझना चाहिए। [[कूर्म पुराण]] में आया है कि "अमावस्या के दिन पितर लोग वायव्य रूप धारण कर अपने पुराने निवास के द्वार पर आते हैं और देखते हैं कि उनके कुल के लोगों के द्वारा श्राद्ध किया जाता है कि नहीं। ऐसा वे सूर्यास्त तक देखते हैं। जब सूर्यास्त हो जाता है, वे भूख एवं प्यास से व्याकुल हो निराश हो जाते हैं, चिन्तित हो जाते हैं, बहुत देर तक दीर्घ श्वास छोड़ते हैं और अन्त में अपने वंशजों को कोसते (उनकी भर्त्सना करते हुए) चले जाते हैं। जो लोग [[अमावस्या]] को जल या शाक-भाजी से भी श्राद्ध नहीं करते उनके पितर उन्हें अभिशापित कर चले जाते हैं।"
 
====श्राद्ध एवं श्रद्धा में घनिष्ठ सम्बन्ध====
 
'श्राद्ध' शब्द की व्युत्पत्ति पर भी कुछ लिख देना आवश्यक है। यह स्पष्ट है कि यह शब्द "श्रद्धा" से बना है। [[ब्रह्मपुराण]] (उपर्युक्त उद्धृत), [[मरीचि]] एवं [[बृहस्पति]] की परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि श्राद्ध एवं श्रद्धा में घनिष्ठ सम्बन्ध है। श्राद्ध में श्राद्धकर्ता का यह अटल विश्वास रहता है कि मृत या पितरों के कल्याण के लिए ब्राह्मणों को जो कुछ भी दिया जाता है वह उसे या उन्हें किसी प्रकार अवश्य ही मिलता है। [[स्कन्द पुराण]]<ref>स्कन्दपुराण (6|218|3</ref> का कथन है कि 'श्राद्ध' नाम इसलिए पड़ा है कि उस कृत्य में श्रद्धा मूल (मूल स्रोत) है। इसका तात्पर्य यह है कि इसमें न केवल विश्वास है, प्रत्युत एक अटल धारणा है कि व्यक्ति को यह करना ही है। ॠग्वेद<ref>ऋग्वेद (10|151|1-5</ref> में श्रद्धा को देवत्व दिया गया है और वह देवता के समान ही सम्बोधित हैं।<ref>ऋग्वेद (2|26|3; 7|32|14; 8|1|31 एवं 9|113|4)।</ref> कुछ स्थलों पर श्रद्धा शब्द के दो भाग (श्रत् एवं धा) बिना किसी अर्थ परिवर्तन के पृथक्-पृथक् रखे गये हैं।<ref>ऋग्वेद (2|12|5), अथर्ववेद (20|34|5) एवं ऋ. (10|147|1=श्रत्ते दधामि प्रथमाय मन्यवे)।</ref> तैत्तिरीय संहिता<ref>तैत्तिरीय संहिता (7|4|1|1</ref> में आया है–"बृहस्पति ने इच्छा प्रकट की; देव मुझमें विश्वास (श्रद्धा) रखें, मैं उनके पुरोहित का पद प्राप्त करूँ।"<ref>ऋग्वेद (1|103|5)।</ref> निरुक्त<ref>निरुक्त (3|10</ref> में 'श्रत्' एवं 'श्रद्धा' का 'सत्य' के अर्थ में व्यक्त किया गया है। वाज. सं.<ref>वाज. सं. (19|77</ref> में कहा गया है कि प्रजापति ने 'श्रद्धा' को सत्य में और 'अश्रद्धा' को झूठ में रख दिया है, और वाज. सं.<ref>वाज. सं. (19|30</ref> में कहा गया है कि सत्य की प्राप्ति श्रद्धा से होती है।
 
वैदिकोत्तरकालीन साहित्य में [[पाणिनी]]<ref>पाणिनी (5|2|85</ref> ने 'श्राद्धिन्' एवं 'श्राद्धिक' को 'वह जिसने श्राद्ध भोजन कर लिया हो' के अर्थ में निश्चित किया गया है। 'श्राद्ध' शब्द 'श्रद्धा' से निकाला जा सकता है।<ref>पा. 5|1|109</ref> योगसूत्र<ref>योगसूत्र (1|20</ref> के भाष्य में 'श्रद्धा' शब्द कई प्रकार से परिभाषित है-'श्रद्धा चेत्तस: संप्रसाद:। सा हि जननीव कल्याणी योगिनं पाति', अर्थात् श्रद्धा को मन का प्रसाद या अक्षोभ (स्थैर्य) कहा गया है। देवल ने श्रद्धा की परिभाषा यों की है-'प्रत्ययो धर्मकार्येषु तथा श्रद्धेत्युदाह्रता। नास्ति ह्यश्रद्धधानस्य धर्मकृत्ये प्रयोजनम्।।'<ref>कृत्यरत्नाकर, पृष्ठ 16 एवं श्राद्धतत्त्व, पृष्ठ 189</ref> अर्थात् धार्मिक कृत्यों में जो प्रत्यय (या विश्वास) होता है, वही श्रद्धा है, जिसे प्रत्यय नहीं है, उसे धार्मिक कर्म करने का प्रयोजन नहीं है। कात्यायन के श्राद्धसूत्र<ref>श्राद्धसूत्र (हेमाद्रि, पृष्ठ 152</ref> में व्यवस्था है- 'श्रद्धायुक्त व्यक्ति शाक से भी श्राद्ध करे (भले ही उसके पास अन्य भोज्य पदार्थ न हों)।' मनु<ref>मनु (3|275</ref> जहाँ पर पितरों की संतुष्टि के लिए श्राद्ध पर बल दिया गया है। [[मार्कण्डेय पुराण]]<ref>मार्कण्डेय पुराण (29|27</ref> में श्राद्ध का सम्बन्ध श्रद्धा से घोषित किया गया है और कहा गया है कि श्राद्ध में जो कुछ भी दिया जाता है, वह पितरों के द्वारा प्रयुक्त होने वाले उस भोजन में परिवर्तित हो जाता है, जिसे वे कर्म एवं पुनर्जन्म के सिद्धान्त के अनुसार नये शरीर के रूप में पाते हैं। इस [[पुराण]] में यह भी आया है कि अनुचित एवं अन्यायपूर्ण ढंग से प्राप्त धन से जो श्राद्ध किया जाता है, वह चाण्डाल, पुक्कस तथा अन्य नीच योनियों में उत्पन्न लोगों की सन्तुष्टि का साधन होता है।<ref>श्रद्धया परया दत्तं पितृणां नामगोत्रत:। यदाहारास्तु ते जातास्तदाहारत्वमेति तत्।। मार्कण्डेयपुराण (29|27); अन्यायोपार्जितैरर्थेर्यच्छ्राद्धं क्रियते नरै:। तृप्यन्ते तेन चाण्डालपुक्कसाद्यासु योनिषु।। मार्कण्डेय. (28|16) एवं स्कन्द. (7|1|205|22)।</ref>
 
====यज्ञ====
 
{{मुख्य|यज्ञ}}
 
हिन्दू धर्म-ग्रन्थों के अनुसार प्रत्येक गृहस्थ [[हिन्दू]] को पाँच यज्ञों को अवश्य करना चाहिए-
 
# ब्रह्म-यज्ञ - प्रतिदिन अध्ययन और अध्यापन करना ही ब्रह्म-यज्ञ है।
 
# देव-यज्ञ - देवताओं की प्रसन्नता हेतु पूजन-हवन आदि करना।
 
# पितृ-यज्ञ - 'श्राद्ध' और 'तर्पण' करना ही पितृ-यज्ञ है।
 
# भूत-यज्ञ - 'बलि' और 'वैश्व देव' की प्रसन्नता हेतु जो पूजा की जाती है, उसे 'भूत-यज्ञ' कहते हैं।
 
# मनुष्य-यज्ञ - इसके अन्तर्गत 'अतिथि-सत्कार' आता है।
 
उक्त पाँचों यज्ञों को नित्य करने का निर्देश है।
 
 
==श्राद्ध की आहुति==
 
==श्राद्ध की आहुति==
 
{{Main|श्राद्ध की आहुति}}
 
{{Main|श्राद्ध की आहुति}}
 
आहुतियों के विषय में भी मत मतान्तर हैं। [[काठक गृह्यसूत्र]]<ref>काठक गृह्यसूत्र (61|3</ref>, जैमिनिय गृह्यसूत्र<ref>जैमिनिय गृह्यसूत्र (2|3</ref> एवं शांखायन गृह्यसूत्र<ref>शांखायन गृह्यसूत्र (3|12|2</ref> ने कहा है कि तीन विभिन्न अष्टकाओं में सिद्ध (पके हुए) शाक, मांस एवं अपूप (पूआ या रोटी) की आहुतियाँ दी जाती हैं। किन्तु पार. गृह्यसूत्र<ref>पार. गृह्यसूत्र (3|3</ref> एवं खादिरगृह्यसूत्र<ref>खादिरगृह्यसूत्र (3|3|29-30</ref> ने प्रथम अष्टका के लिए अपूपों (पूओं) की<ref>इसी से गोभिलगृ. 3|10|9 ने इसे अपूपाष्टका कहा है</ref> एवं अन्तिम के लिए सिद्ध शाकों की व्यवस्था दी है। खादिरगृह्यसूत्र<ref>खादिरगृह्यसूत्र (3|4|1</ref> से गाय की बलि होती हैं आश्वलायन गृह्यसूत्र<ref>आश्वलायन गृह्यसूत्र (2|4|7-10</ref>, गोभिलगृह्यसूत्र<ref>गोभिलगृह्यसूत्र (4|1|18-22</ref>, कौशिक<ref>कौशिक (138|2</ref> एवं बौधायन गृह्यसूत्र<ref>बौधायन गृह्यसूत्र (2|11|51|61</ref> के मत से इसके कई विकल्प भी हैं–गाय या भेंड़ या बकरे की बलि देना; सुलभ जंगली मांस या मुध-तिल युक्त मांस या गेंडा, हिरन, भैंसा, सूअर, शशक, चित्ती वाले हिरन, रोहित हिरन, [[कबूतर]] या तीतर, सारंग एवं अन्य पक्षियों का मांस या किसी बूढ़े लाल बकरे का मांस; मछलियाँ; दूघ में पका हुआ चावल (लपसी के समान), या बिना पके हुए अन्न या फल या मूल, या सोना भी दिया जा सकता है, अथवा गायों या साँड़ों के लिए केवल घास खिलायी जा सकती है। या वेदज्ञ को पानी रखने के लिए घड़े दिये जा सकते हैं, या 'यह मैं अष्टका का सम्पादन करता हूँ' ऐसा कहकर श्राद्धसम्बन्धी मंत्रों का उच्चारण किया जा सकता है।  
 
आहुतियों के विषय में भी मत मतान्तर हैं। [[काठक गृह्यसूत्र]]<ref>काठक गृह्यसूत्र (61|3</ref>, जैमिनिय गृह्यसूत्र<ref>जैमिनिय गृह्यसूत्र (2|3</ref> एवं शांखायन गृह्यसूत्र<ref>शांखायन गृह्यसूत्र (3|12|2</ref> ने कहा है कि तीन विभिन्न अष्टकाओं में सिद्ध (पके हुए) शाक, मांस एवं अपूप (पूआ या रोटी) की आहुतियाँ दी जाती हैं। किन्तु पार. गृह्यसूत्र<ref>पार. गृह्यसूत्र (3|3</ref> एवं खादिरगृह्यसूत्र<ref>खादिरगृह्यसूत्र (3|3|29-30</ref> ने प्रथम अष्टका के लिए अपूपों (पूओं) की<ref>इसी से गोभिलगृ. 3|10|9 ने इसे अपूपाष्टका कहा है</ref> एवं अन्तिम के लिए सिद्ध शाकों की व्यवस्था दी है। खादिरगृह्यसूत्र<ref>खादिरगृह्यसूत्र (3|4|1</ref> से गाय की बलि होती हैं आश्वलायन गृह्यसूत्र<ref>आश्वलायन गृह्यसूत्र (2|4|7-10</ref>, गोभिलगृह्यसूत्र<ref>गोभिलगृह्यसूत्र (4|1|18-22</ref>, कौशिक<ref>कौशिक (138|2</ref> एवं बौधायन गृह्यसूत्र<ref>बौधायन गृह्यसूत्र (2|11|51|61</ref> के मत से इसके कई विकल्प भी हैं–गाय या भेंड़ या बकरे की बलि देना; सुलभ जंगली मांस या मुध-तिल युक्त मांस या गेंडा, हिरन, भैंसा, सूअर, शशक, चित्ती वाले हिरन, रोहित हिरन, [[कबूतर]] या तीतर, सारंग एवं अन्य पक्षियों का मांस या किसी बूढ़े लाल बकरे का मांस; मछलियाँ; दूघ में पका हुआ चावल (लपसी के समान), या बिना पके हुए अन्न या फल या मूल, या सोना भी दिया जा सकता है, अथवा गायों या साँड़ों के लिए केवल घास खिलायी जा सकती है। या वेदज्ञ को पानी रखने के लिए घड़े दिये जा सकते हैं, या 'यह मैं अष्टका का सम्पादन करता हूँ' ऐसा कहकर श्राद्धसम्बन्धी मंत्रों का उच्चारण किया जा सकता है।  
====मृत पूर्वजों के कृत्य====
 
अति प्राचीन काल में मृत पूर्वजों के लिए केवल तीन कृत्य किये जाते थे:-
 
#पिण्डपितृयज्ञ (उनके द्वारा किया गया जो श्रौताग्नियों में यज्ञ करते थे) या मासिक श्राद्ध (उनके द्वारा जो श्रौताग्नियों में यज्ञ नहीं करते थे)<ref>देखिए आश्वलायन गृह्यसूत्र 2|5|10, हिरण्यकेशिगृह्यसूत्र 2|10|17, आपस्तम्ब गृह्यसूत्र 8|21|1, विष्णुपुराण 3|14|3, आदि</ref>,
 
#महापितृयज्ञ एवं
 
#अष्टकाश्राद्ध।
 
प्रथम दो का वर्णन इस ग्रन्थ के खण्ड 2, अध्याय 30 एवं 31 में हो चुका है। अष्टका श्राद्धों के विषय में अभी तक कुछ नहीं बताया गया है। इनका विशिष्ट महत्त्व है, किन्तु इनके सम्पादन के दिनों एवं मासों, अधिष्ठाता देवों, आहुतियों एवं विधि के विषय में लेखकों में मतैक्य नहीं है।
 
 
[[गौतम]]<ref>गौतम. (8|19</ref> ने अष्टका को सात पाकयज्ञों एवं चालीस संस्कारों में परिगणित किया है। लगता है, 'अष्टका' [[पूर्णिमा]] के पश्चात् किसी मास की [[अष्टमी]] तिथि का द्योतक है।<ref>शतपथ ब्राह्मण 6|4|2|40</ref> शतपथ ब्राह्मण<ref>शतपथ ब्राह्मण (6|2|2|23</ref> में आया है–'पूर्णिमा के पश्चात् आठवें दिन वह (अग्निचयनकर्ता) अग्नि-स्थान (चुल्लि या चुल्ली, चूल्ही या चूल्हे) के लिए सामग्री एकत्र करता है, क्योंकि प्रजापति के लिए (पूर्णिमा के पश्चात्) अष्टमी पवित्र है और प्रजापति के लिए यह कृत्य पवित्र है।' जैमिनिय<ref>जैमिनिय (1|3|2</ref> के भाष्य में [[शबर]] ने [[अथर्ववेद]]<ref>अथर्ववेद (3|10|2</ref> एवं आपस्तम्ब मंत्र पाठ <ref>आपस्तम्ब (20|27</ref> में आये हुए मंत्र को अष्टका का द्योतक माना है। मंत्र यह है–'वह (अष्टका) रात्रि हमारे लिए मंगलकारी हो, जिसका लोग किसी की ओर आती हुई गौ के समान स्वागत करते हैं, और जो वर्ष की पत्नी है।'<ref>अष्टकालिंगाश्च मंत्रा वेदे दृश्यन्ते यां जना: प्रतिनन्दतीत्येवमादय:। शबर (जैमिनि. 1|3|2)। शबर ने इसे जैमिनि. (6|5|35) में इस प्रकार से पढ़ा है–'यां जना: प्रतिनन्दन्ति रात्रि धेनुमिवायतीम्। संवत्सरस्य या पत्नी सा नो अस्तु सुमंगली।।' और उन्होंने जोड़ दिया है–'अष्टकार्य सुराधसे स्वाहा'। अथर्ववेद (3|10|2) में 'जना:' के स्थान पर 'देवा:' एवं धेनुमिवायतीम्' के स्थान पर धेनुमुपायतीम् आया है।</ref> अथर्ववेद<ref>अथर्ववेद (3|10|8</ref> में संवत्सर को एकाष्टका का पति कहा गया है। तैत्तिरीय संहिता<ref>तैत्तिरीय संहिता (7|4|8|1</ref> में आया है कि 'जो लोग संवत्सर सत्र के लिए दीक्षा लेने वाले हैं उन्हें एकाष्टका के दिन दीक्षा लेनी चाहिए, जो एकाष्टका कहलाती है। वह वर्ष की पत्नी है।' जैमिनिय<ref>जैमिनिय (6|5|32-37</ref> ने एकाष्टका को माघ की पूर्णिमा के पश्चात् की अष्टमी कहा है। [[आपस्तम्बगृह्यसूत्र|आपस्तम्ब गृह्यसूत्र]]<ref>आपस्तम्ब गृह्यसूत्र (हरदत्त, गौतम. 8|19</ref> ने भी यही कहा है। किन्तु इतना जोड़ दिया है कि उस तिथि (अष्टमी) में चन्द्र ज्येष्ठा नक्षत्र में होता है।<ref>पाणिनि (7|3|85) के एक वार्तिक के अनुसार 'अष्टका' शब्द 'अष्टन' से बना है। पा. (7|3|45) का 9वाँ वार्तिक हमें बताता है कि 'अष्टन' से 'अष्टका' व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ है कि वह कृत्य जिसके अधिष्ठाता देवता पितर लोग हैं, और 'अष्टिका' शब्द का अर्थ कुछ और है, यथा 'अष्टिका खारी'।</ref> इसकी अर्थ यह हुआ कि यदि अष्टमी दो दिनों की हो गयी तो वह दिन जब चन्द्र ज्येष्ठा में है, एकाष्टका कहलायेगा। हिरण्यकेशी गृह्यसूत्र<ref>हिरण्यकेशी गृह्यसूत्र (2|15|9</ref> ने भी एकाष्टका को वर्ष की पत्नी कहा है।'<ref>माघ की पूर्णिमा वर्ष का मुख कहलाती है। अर्थात् प्राचीन काल में उसी से वर्ष का आरम्भ माना जाता था। [[पूर्णिमा]] के पश्चात् अष्टका दिन पूर्णिमा के उपरान्त का प्रथम एवं अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पर्व था और यह वर्षारम्भ (वर्ष आरम्भ होने) से छोटा माना जाता था। सम्भवत: इसी कारण यह वर्ष की पत्नी कहा गया है।</ref>
 
====अष्टका कृत्य====
 
{{Main|अष्टका कृत्य (श्राद्ध)}}
 
आश्वलायन गृह्यसूत्र<ref>आश्वलायन गृह्यसूत्र (2|4|1</ref> के मत से अष्टका के दिन (अर्थात् कृत्य) चार थे, हेमन्त एवं शिशिर (अर्थात् [[मार्गशीर्ष]], [[पौष]], [[माघ]] एवं [[फाल्गुन]]) की दो [[ऋतु|ऋतुओं]] के चार मासों के [[कृष्ण पक्ष|कृष्ण पक्षों]] की आठवीं तिथियाँ। अधिकांश में सभी गृह्यसूत्र, यथा–मानवगृह्यसुत्र<ref>मानवगृह्यसुत्र (218</ref>, शांखायन गृह्यसूत्र<ref>शांखायन गृह्यसूत्र (3|12|1</ref>, खादिरगृह्यसूत्र<ref>खादिरगृह्यसूत्र (3|2|27</ref>, काठकगृह्यसूत्र<ref>काठकगृह्यसूत्र (61|1</ref>, कौषितकि गृह्यसूत्र<ref>कौषितकि गृह्यसूत्र (3|15|1</ref> एवं पार. गृह्यसूत्र<ref>पार. गृह्यसूत्र (3|3</ref> कहते हैं कि केवल तीन ही अष्टका कृत्य होते हैं; [[मार्गशीर्ष]] (आग्रहायण) की [[पूर्णिमा]] के पश्चात् आठवीं तिथि (इसे आग्रहायणी कहा जाता था); अर्थात् [[मार्गशीर्ष]], [[पौष]] (तैष) एवं [[माघ]] के [[कृष्ण पक्ष|कृष्ण पक्षों]] में। गोभिलगृह्यसूत्र<ref>गोभिलगृह्यसूत्र (3|10|48</ref> ने लिखा है कि कौत्स के मत से अष्टकाएँ चार हैं और सभी में मास दिया जाता है, किन्तु गौतम, औदगाहमानि एवं वार्कखण्डि ने केवल तीन की व्यवस्था दी है। बौधायन गृह्यसूत्र<ref>बौधायन गृह्यसूत्र (2|11|1</ref> के मत से तैष, माघ एवं [[फाल्गुन]] में तीन अष्टकाहोम किये जाते हैं।
 
====अन्वष्टका कृत्य====
 
{{Main|अन्वष्टका कृत्य (श्राद्ध)}}
 
यद्यपि [[आपस्तम्बगृह्यसूत्र]]<ref>आपस्तम्बगृह्यसूत्र (2|5|3</ref> एवं शांखायन गृह्यसूत्र<ref>शांखायन गृह्यसूत्र (3|13|7</ref> का कथन है कि अन्वष्टका कृत्य में पिण्डपितृयज्ञ की विधि मानी जाती है, किन्तु कुछ गृह्यसूत्र<ref>यथा खादिरगृह्यसूत्र 3|5 एवं गोभिलगृह्यसूत्र 4|2-3</ref> इस कृत्य का विशद वर्णन करते हैं। आश्वलायन गृह्यसूत्र एवं [[विष्णु धर्मसूत्र]]<ref>आश्वलायन गृह्यसूत्र एवं [[विष्णु धर्मसूत्र]] (74</ref> ने मध्यम मार्ग अपनाया है। आश्वलायन गृह्यसूत्र का वर्णन अपेक्षाकृत संक्षिप्त है। यह ज्ञातव्य है कि कुछ गृह्यसूत्रों का कथन है कि अन्वष्टका कृत्य कृष्ण पक्ष की [[नवमी]] या [[दशमी]] को किया जाता है।<ref>खादिरगृह्यसूत्र 3|5|1</ref> इसे पारस्कर गृह्यसूत्र<ref>पारस्कर गृह्यसूत्र (3|3|30</ref>, [[मनुस्मृति|मनु]]<ref>मनु (4|150</ref> एवं [[विष्णु धर्मसूत्र]]<ref>विष्णु धर्मसूत्र (74|1 एवं 76|10</ref> ने अन्वष्टका की संज्ञा दी है। अत्यन्त विशिष्ट बात यह है कि इस कृत्य में स्त्री पितरों का आहावान किया जाता है और इसमें जो आहुतियाँ दी जाती हैं, उनमें सुरा, माँड़, अंजन, लेप एवं मालाएँ भी सम्मिलित रहती हैं। यद्यपि आश्वलायन गृह्यसूत्र<ref>आश्वलायन गृह्यसूत्र (2|5</ref> आदि ने घोषित किया है कि अष्टका एवं अन्वष्टक्य मासिक श्राद्ध या पिण्डपितृयज्ञ पर आधारित हैं तथापि बौधायन गृह्यसूत्र<ref>बौधायन गृह्यसूत्र (3|12|1</ref>, गोभिलगृह्यसूत्र<ref>गोभिलगृह्यसूत्र (4|4</ref> एवं खादिर गृह्यसूत्र<ref>खादिर गृह्यसूत्र (3|5|35</ref> ने कहा है कि अष्टका या अन्वष्टक्य के आधार पर ही पिण्डपितृयज्ञ एवं अन्य श्राद्ध किये जाते हैं। काठक गृह्यसूत्र<ref>काठक गृह्यसूत्र (66|1|68, 68|1 एवं 69|1</ref> का कथन है कि प्रथम श्राद्ध, सपिण्डिकरण जैसे अन्य श्राद्ध, पशुश्राद्ध (जिसमें पशु का मांस अर्पित किया जाता है) एवं मासिक श्राद्ध अष्टका की विधि का ही अनुसरण करते हैं।
 
====माध्यावर्ष कृत्य====
 
{{Main|माध्यावर्ष कृत्य (श्राद्ध)}}
 
आश्वलायन गृह्यसूत्र<ref>आश्वलायन गृह्यसूत्र (2|5|9</ref> में माध्यावर्ष नामक कृत्य के विषय में दो मत प्रकाशित किये गये हैं। नारायण के मत से यह कृत्य [[भाद्रपद]] [[कृष्ण पक्ष]] की तीन तिथियों में, अर्थात् [[सप्तमी]], [[अष्टमी]] एवं [[नवमी]] को किया जाता है। दूसरा मत यह है कि यह कृत्य अष्टकाओं के समान ही है जो [[भाद्रपद]] की [[त्रयोदशी]] को सम्पादित होता है। जबकि सामान्यत: चन्द्र [[मघा नक्षत्र]] में होता है। इस कृत्य के नाम में संदेह है, क्योंकि पाण्डुलिपियों में बहुत से रूप प्रस्तुत किये गये हैं।
 
====अन्वाहार्य श्राद्ध====
 
{{Main|अन्वाहार्य श्राद्ध}}
 
*गोभिलगृह्यसूत्र<ref>गोभिलगृह्यसूत्र (4|4|3</ref> में अन्वाहार्य नामक एक अन्य श्राद्ध का उल्लेख हुआ है जो कि पिण्डपितृयज्ञ उपरान्त उसी दिन सम्पादित होता है।
 
*शांखायन गृह्यसूत्र<ref>शांखायन गृह्यसूत्र (4|1|13</ref> ने पिण्डपितृयज्ञ से पृथक् मासिक श्राद्ध की चर्चा की है।
 
*[[मनु]]<ref>मनु (3|122-123</ref> का कथन है–'पितृयज्ञ (अर्थात् पिण्डपितृयज्ञ) के सम्पादन के उपरान्त वह ब्राह्मण जो अग्निहोत्री अर्थात् आहिताग्नि है, प्रति मास उसे अमावास्या के दिन पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध करना चाहिए। 
 
 
==विशद वर्णन==
 
==विशद वर्णन==
 
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*[http://hariomgroup.net/hariombooks/satsang/Hindi/ShraadhMahima.htm#_Toc208636921 श्राद्ध महिमा]
 
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==संबंधित लेख==
 
==संबंधित लेख==
{{हिन्दू कर्मकाण्ड}}{{संस्कृत साहित्य}}
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13:26, 13 सितम्बर 2017 का अवतरण

श्राद्ध विषय सूची
Warning-sign-small.png यह लेख पौराणिक ग्रंथों अथवा मान्यताओं पर आधारित है अत: इसमें वर्णित सामग्री के वैज्ञानिक प्रमाण होने का आश्वासन नहीं दिया जा सकता। विस्तार में देखें अस्वीकरण

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श्राद्ध
श्राद्ध कर्म में पूजा करते ब्राह्मण
अन्य नाम पितृ पक्ष
अनुयायी सभी हिन्दू धर्मावलम्बी
उद्देश्य श्राद्ध पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक हैं। पितरों के निमित्त विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है, उसी को 'श्राद्ध' कहते हैं।
प्रारम्भ वैदिक-पौराणिक
तिथि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से सर्वपितृ अमावस्या अर्थात आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक
अनुष्ठान श्राद्ध-कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिश्रित करके 'पिण्ड' बनाते हैं, उसे 'सपिण्डीकरण' कहते हैं। पिण्ड का अर्थ है शरीर। यह एक पारंपरिक विश्वास है कि हर पीढ़ी के भीतर मातृकुल तथा पितृकुल दोनों में पहले की पीढ़ियों के समन्वित 'गुणसूत्र' उपस्थित होते हैं। यह प्रतीकात्मक अनुष्ठान जिन जिन लोगों के गुणसूत्र (जीन्स) श्राद्ध करने वाले की अपनी देह में हैं, उनकी तृप्ति के लिए होता है।
संबंधित लेख पितृ पक्ष, श्राद्ध के नियम, अन्वष्टका कृत्य, अष्टका कृत्य, अन्वाहार्य श्राद्ध, श्राद्ध विसर्जन, पितृ विसर्जन अमावस्या, तर्पण, माध्यावर्ष कृत्य, मातामह श्राद्ध, पितर, श्राद्ध और ग्रहण, श्राद्ध करने का स्थान, श्राद्ध की आहुति, श्राद्ध की कोटियाँ, श्राद्ध की महत्ता, श्राद्ध प्रपौत्र द्वारा, श्राद्ध फलसूची, श्राद्ध वर्जना, श्राद्ध विधि, पिण्डदान, गया, नासिक, आदित्य देवता और रुद्र देवता
अन्य जानकारी ब्रह्म पुराण के अनुसार श्राद्ध की परिभाषा- 'जो कुछ उचित काल, पात्र एवं स्थान के अनुसार उचित (शास्त्रानुमोदित) विधि द्वारा पितरों को लक्ष्य करके श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दिया जाता है', श्राद्ध कहलाता है।

श्राद्ध पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक हैं। पितरों के निमित्त विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है, उसी को 'श्राद्ध' कहते हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार, प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता-पिता, पूर्वजों को नमस्कार या प्रणाम करना हमारा कर्तव्य है, हमारे पूर्वजों की वंश परम्परा के कारण ही हम आज यह जीवन देख रहे हैं, इस जीवन का आनंद प्राप्त कर रहे हैं। इस धर्म में, ऋषियों ने वर्ष में एक पक्ष को पितृपक्ष का नाम दिया, जिस पक्ष में हम अपने पितरेश्वरों का श्राद्ध, तर्पण, मुक्ति हेतु विशेष क्रिया संपन्न कर उन्हें अर्ध्य समर्पित करते हैं। यदि किसी कारण से उनकी आत्मा को मुक्ति प्रदान नहीं हुई है तो हम उनकी शांति के लिए विशिष्ट कर्म करते है, जिसे 'श्राद्ध' कहते हैं।

श्राद्ध एक परिचय

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ब्रह्म पुराण ने श्राद्ध की परिभाषा इस प्रकार की है, 'जो कुछ उचित काल, पात्र एवं स्थान के अनुसार उचित (शास्त्रानुमोदित) विधि द्वारा पितरों को लक्ष्य करके श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दिया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है।[1]

पिण्ड का अर्थ

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श्राद्ध-कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिश्रित करके पिण्ड बनाते हैं, उसे 'सपिण्डीकरण' कहते हैं। पिण्ड का अर्थ है शरीर। यह एक पारंपरिक विश्वास है, जिसे विज्ञान भी मानता है कि हर पीढ़ी के भीतर मातृकुल तथा पितृकुल दोनों में पहले की पीढ़ियों के समन्वित 'गुणसूत्र' उपस्थित होते हैं। चावल के पिण्ड जो पिता, दादा, परदादा और पितामह के शरीरों का प्रतीक हैं, आपस में मिलकर फिर अलग बाँटते हैं। यह प्रतीकात्मक अनुष्ठान जिन जिन लोगों के गुणसूत्र (जीन्स) श्राद्ध करने वाले की अपनी देह में हैं, उनकी तृप्ति के लिए होता है।

श्राद्ध के नियम

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दैनिक पंच यज्ञों में पितृ यज्ञ को ख़ास बताया गया है। इसमें तर्पण और समय-समय पर पिण्डदान भी सम्मिलित है। पूरे पितृपक्ष भर तर्पण आदि करना चाहिए। इस दौरान कोई अन्य शुभ कार्य या नया कार्य अथवा पूजा-पाठ अनुष्ठान सम्बन्धी नया काम नहीं किया जाता। साथ ही श्राद्ध नियमों का विशेष पालन करना चाहिए। परन्तु नित्य कर्म तथा देवताओं की नित्य पूजा जो पहले से होती आ रही है, उसको बन्द नहीं करना चाहिए।

श्राद्ध के वैज्ञानिक पहलू

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श्राद्ध करते श्रद्धालु

जन्म एवं मृत्यु का रहस्य अत्यन्त गूढ़ है। वेदों में, दर्शन शास्त्रों में, उपनिषदों एवं पुराणों आदि में हमारे ऋषियों-मनीषियों ने इस विषय पर विस्तृत विचार किया है। श्रीमदभागवत में भी स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जन्म लेने वाले की मृत्यु और मृत्यु को प्राप्त होने वाले का जन्म निश्चित है। यह प्रकृति का नियम है। शरीर नष्ट होता है मगर आत्मा कभी भी नष्ट नहीं होती है। वह पुन: जन्म लेती है और बार-बार जन्म लेती है। इस पुन: जन्म के आधार पर ही कर्मकाण्ड में श्राद्धदि कर्म का विधान निर्मित किया गया है। अपने पूर्वजों के निमित्त दी गई वस्तुएँ सचमुच उन्हें प्राप्त होती हैं या नहीं, इस विषय में अधिकांश लोगों को संदेह है। हमारे पूर्वज अपने कर्मानुसार किस योनि में उत्पन्न हुए हैं, जब हमें इतना ही नहीं मालूम तो फिर उनके लिए दिए गए पदार्थ उन तक कैसे पहुँच सकते हैं? क्या एक ब्राह्मण को भोजन कराने से हमारे पूर्वजों का पेट भर सकता है? न जाने इस तरह के कितने ही सवाल लोगों के मन में उठते होंगे। वैसे इन प्रश्नों का सीधे-सीधे उत्तर देना सम्भव भी नहीं है, क्योंकि वैज्ञानिक मापदण्डों को इस सृष्टि की प्रत्येक विषयवस्तु पर लागू नहीं किया जा सकता। दुनिया में ऐसी कई बातें हैं, जिनका कोई प्रमाण न मिलते हुए भी उन पर विश्वास करना पड़ता है।

श्राद्ध-कर्म की संक्षिप्त विधि

पिण्डदान करते श्रद्धालु

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  • श्राद्ध दिवस से पूर्व दिवस को बुद्धिमान पुरुष श्रोत्रिय आदि से विहित ब्राह्मणों को 'पितृ-श्राद्ध' तथा ‘वैश्व-देव-श्राद्ध’ के लिए निमंत्रित करें।
  • पितृ-श्राद्ध के लिए सामर्थ्यानुसार अयुग्म तथा वैश्व-देव-श्राद्ध के लिए युग्म ब्राह्मणों को निमंत्रित करना चाहिए।
  • निमंत्रित तथा निमंत्रक क्रोध, स्त्रीगमन तथा परिश्रम आदि से दूर रहे।

पितृ का अर्थ

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'पितृ' का अर्थ है 'पिता', किन्तु 'पितर' शब्द जो दो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है:-

  1. व्यक्ति के आगे के तीन मृत पूर्वज
  2. मानव जाति के प्रारम्भ या प्राचीन पूर्वज जो एक पृथक् लोक के अधिवासी के रूप में कल्पित हैं।[2]

तपर्ण

पूजा अर्चना करते श्रद्धालु

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आवाहन, पूजन, नमस्कार के उपरान्त तर्पण किया जाता है। जल में दूध, जौ, चावल, चन्दन डाल कर तर्पण कार्य में प्रयुक्त करते हैं। मिल सके, तो गंगा जल भी डाल देना चाहिए। तृप्ति के लिए तर्पण किया जाता है। स्वगर्स्थ आत्माओं की तृप्ति किसी पदार्थ से, खाने-पहनने आदि की वस्तु से नहीं होती, क्योंकि स्थूल शरीर के लिए ही भौतिक उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। मरने के बाद स्थूल शरीर समाप्त होकर, केवल सूक्ष्म शरीर ही रह जाता है। सूक्ष्म शरीर को भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि की आवश्यकता नहीं रहती, उसकी तृप्ति का विषय कोई, खाद्य पदार्थ या हाड़-मांस वाले शरीर के लिए उपयुक्त उपकरण नहीं हो सकते। सूक्ष्म शरीर में विचारणा, चेतना और भावना की प्रधानता रहती है, इसलिए उसमें उत्कृष्ट भावनाओं से बना अन्तःकरण या वातावरण ही शान्तिदायक होता है।

श्राद्ध की महत्ता

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सूत्रकाल (लगभग ई. पू. 600) से लेकर मध्यकाल के धर्मशास्त्रकारों तक सभी लोगों ने श्राद्ध की महत्ता एवं उससे उत्पन्न कल्याण की प्रशंसा के पुल बाँध दिये हैं। आपस्तम्ब धर्मसूत्र[3] ने अधोलिखित सूचना दी है- 'पुराने काल में मनुष्य एवं देव इसी लोक में रहते थे। देव लोग यज्ञों के कारण (पुरस्कारस्वरूप) स्वर्ग चले गये, किन्तु मनुष्य यहीं पर रह गये। जो मनुष्य देवों के समान यज्ञ करते हैं वे परलोक (स्वर्ग) में देवों एवं ब्रह्मा के साथ निवास करते हैं। तब (मनुष्यों को पीछे रहते देखकर) मनु ने उस कृत्य को आरम्भ किया जिसे श्राद्ध की संज्ञा मिली है, जो मानव जाति को श्रेय (मुक्ति या आनन्द) की ओर ले जाता है। इस कृत्य में पितर लोग देवता (अधिष्ठाता) हैं, किन्तु ब्राह्मण लोग (जिन्हें भोजन दिया जाता है) आहवानीय अग्नि (जिसमें यज्ञों के समय आहुतियाँ दी जाती हैं) के स्थान पर माने जाते हैं।"

श्राद्ध की आहुति

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आहुतियों के विषय में भी मत मतान्तर हैं। काठक गृह्यसूत्र[4], जैमिनिय गृह्यसूत्र[5] एवं शांखायन गृह्यसूत्र[6] ने कहा है कि तीन विभिन्न अष्टकाओं में सिद्ध (पके हुए) शाक, मांस एवं अपूप (पूआ या रोटी) की आहुतियाँ दी जाती हैं। किन्तु पार. गृह्यसूत्र[7] एवं खादिरगृह्यसूत्र[8] ने प्रथम अष्टका के लिए अपूपों (पूओं) की[9] एवं अन्तिम के लिए सिद्ध शाकों की व्यवस्था दी है। खादिरगृह्यसूत्र[10] से गाय की बलि होती हैं आश्वलायन गृह्यसूत्र[11], गोभिलगृह्यसूत्र[12], कौशिक[13] एवं बौधायन गृह्यसूत्र[14] के मत से इसके कई विकल्प भी हैं–गाय या भेंड़ या बकरे की बलि देना; सुलभ जंगली मांस या मुध-तिल युक्त मांस या गेंडा, हिरन, भैंसा, सूअर, शशक, चित्ती वाले हिरन, रोहित हिरन, कबूतर या तीतर, सारंग एवं अन्य पक्षियों का मांस या किसी बूढ़े लाल बकरे का मांस; मछलियाँ; दूघ में पका हुआ चावल (लपसी के समान), या बिना पके हुए अन्न या फल या मूल, या सोना भी दिया जा सकता है, अथवा गायों या साँड़ों के लिए केवल घास खिलायी जा सकती है। या वेदज्ञ को पानी रखने के लिए घड़े दिये जा सकते हैं, या 'यह मैं अष्टका का सम्पादन करता हूँ' ऐसा कहकर श्राद्धसम्बन्धी मंत्रों का उच्चारण किया जा सकता है।

विशद वर्णन

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श्राद्ध संबंधी साहित्य विशाल है। वैदिक संहिताओं से लेकर आधुनिक टीकाओं एवं निबन्धों तक में श्राद्ध के विषय में विशद वर्णन प्राप्त होता है। पुराणों में श्राद्ध के विषय में सहस्रों श्लोक हैं। वैदिक संहिताओं एवं ब्राह्मण ग्रन्थों, गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों से लेकर आरम्भिक स्मृतिग्रन्थों यथा मनु एवं याज्ञवल्क्य की स्मृतियों तक, तदनन्तर प्रतिनिधि पुराण एवं मेधातिथि, विज्ञानेश्वर तथा अपरार्क की टीकाओं द्वारा उपस्थित विवेचनों से लेकर मध्यकालिक निबन्धों तक का वर्णन है। पौराणिक काल में कतिपय शाखाओं की ओर संकेत मिलते हैं।[15] स्मृतियों एवं महाभारत[16] के वचनों तथा सूत्रों, मनु, याज्ञवल्क्य एवं अन्य स्मृतियों की टीकाओं के अतिरिक्त श्राद्ध सम्बन्धी निबन्धों की संख्या अपार है। इस विषय में केवल निम्नलिखित निबन्धों की (काल के अनुसार व्यवस्थित) चर्चा होगी–श्राद्धकल्पतरु, अनिरुद्ध की हारलता एवं पितृदयिता, स्मृत्यर्थसार, स्मृतिचन्द्रिका, चतुर्वर्गचिन्तामणि (श्राद्ध प्रकरण), हेमाद्रि[17], रुद्रधर का श्राद्धविवेक, मदनपारिजात, श्राद्धसार (नृसिंहप्रसाद का एक भाग), गोविन्दानन्द की श्राद्धक्रियाकौमुदी, रघुनन्दन का श्राद्धतत्व, श्राद्धसौख्य[18], विनायक उर्फ नन्द पण्डित की श्राद्धकल्पलता, निर्णयसिन्धु, नीलकण्ठ का श्राद्धमयूख, श्राद्धप्रकाश (वीरमित्रोदय का एक भाग), दिवाकर भट्ट की श्राद्धचन्द्रिका, स्मृतिमुक्ताफल (श्राद्ध पर), धर्मसिन्धु एवं मिताक्षरा की टीका–बालभट्टी। श्राद्धसम्बन्धी विशद वर्णन उपस्थित करते समय, कहीं-कहीं आवश्यकतानुसार सामान्य विचार भी उपस्थित किये जायेंगे।

श्राद्धों की फलसूचियाँ

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संक्रान्ति पर किया गया श्राद्ध अनन्त काल तक के लिए स्थायी होता है, इसी प्रकार जन्म के दिन एवं कतिपय नक्षत्रों में श्राद्ध करना चाहिए। आपस्तम्ब धर्मसूत्र[19], अनुशासन पर्व[20], वायु पुराण[21], याज्ञवल्क्य[22], ब्रह्म पुराण[23], विष्णु धर्मसूत्र[24], कूर्म पुराण[25], ब्रह्माण्ड पुराण[26] ने कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से अमावस्या तक किये गये श्राद्धों के फलों का उल्लेख किया है।

ग्रहण के समय छूट

विष्णुपद मंदिर, गया

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आपस्तम्ब धर्मसूत्र[27], मनु[28], विष्णुधर्मसूत्र[29], कूर्म पुराण[30], ब्रह्माण्ड पुराण[31], भविष्य पुराण[32] ने रात्रि, संध्या (गोधूलि काल) या जब सूर्य का तुरत उदय हुआ हो तब–ऐसे कालों में श्राद्ध सम्पादन मना किया है। किन्तु चन्द्रग्रहण के समय छूट दी है। आपस्तम्ब धर्मसूत्र ने इतना जोड़ दिया है कि यदि श्राद्ध सम्पादन अपरान्ह्न में आरम्भ हुआ हो और किसी कारण से देर हो जाए तथा सूर्य डूब जाए तो कर्ता को श्राद्ध सम्पादन के शेष कृत्य दूसरे दिन ही करने चाहिए और उसे दर्भों पर पिण्ड रखने तक उपवास करना चाहिए।

श्राद्ध करने का स्थान

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मनु[33] ने व्यवस्था दी है कि कर्ता को प्रयास करके दक्षिण की ओर ढालू भूमि खोजनी चाहिए, जो कि पवित्र हो और जहाँ पर मनुष्य अधिकतर न जाते हों। उस भूमि को गोबर से लीप देना चाहिए, क्योंकि पितर लोग वास्तविक स्वच्छ स्थलों, नदी-तटों एवं उस स्थान पर किये गए श्राद्ध से प्रसन्न होते हैं, जहाँ पर लोग बहुधा कम ही जाते हैं। याज्ञवल्क्य[34] ने संक्षिप्त रूप से कहा है कि श्राद्ध स्थल चतुर्दिक से आवृत, पवित्र एवं दक्षिण की ओर ढालू होना चाहिए। शंख[35] का कथन है–'बैलों, हाथियों एवं घोड़ों की पाठ पर, ऊँची भूमि या दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए।' कूर्म पुराण[36] में आया है–वन, पुण्य पर्वत, तीर्थस्थान, मन्दिर–इनके निश्चित स्वामी नहीं होते और ये किसी की वैयक्तिक सम्पत्ति नहीं हैं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. देशे काले च पात्रे च श्रद्धया विधिना च यत्। पितृनुद्दिश्य विप्रभ्यों दत्तं श्राद्धमुदाह्रतम्।। ब्रह्मपुराण (श्राद्धप्रकाश, पृष्ठ 3 एवं 6; श्राद्धकल्पलता, पृष्ठ 3; परा. मा. 1|2, पृष्ठ 299)। मिता. (याज्ञ. 1|217) में आया है–'श्राद्धं नाम्तदनीयस्य तत्स्यानीयसय वा द्रव्यस्य प्रेतोद्देशेन श्रद्धया त्याग:।' श्राद्धकल्पतरु (पृष्ठ 4) में ऐसा कहा गया है–'एतेन पितृनुद्दिश्य द्रव्योत्यागो ब्राह्मणस्वीकरणपर्यन्तं श्राद्धस्वरूपं प्रधानम्।' श्राद्धक्रियाकौमुदी (पृष्ठ 3-4) का कथन है–'कल्पतरुलक्षणमय्यनुर्वादय सन्न्यासिनामात्मश्राद्धे देवश्राद्धे सनकादिश्राद्धे चाव्याप्ते:।' श्रीदत्तकृत पितृभक्ति में आया है–'अत्र कल्पतरुकार: पितृनुद्दिश्य द्रव्यपातो ब्राह्मणस्वीकरणपर्यन्ती हि श्राद्धमित्याह तदयुक्तम्।' दीपकलिका (याज्ञवल्क्यस्मृति 1|128) ने कल्पतरु की बात मानी है। श्राद्धविवेक (पृष्ठ 1) ने इस प्रकार कहा है–'श्राद्धं नाम वेदवोधितपात्रम्भनपूर्वकप्रमीतपित्रादिदेवतोद्देश्यको द्रव्यत्यागविशेष:।' श्राद्धप्रकाश (पृष्ठ 4) ने इस प्रकार कहा है–'अत्रापस्तम्बादिसकलवचनपर्यालोचनया प्रमीतमात्रोद्देश्यकान्नत्यागविशेषस्य ब्राह्मणद्यधिककरण प्रतिपत्त्ययंगकस्य श्राद्धपदार्थत्वं प्रतीययते।' श्राद्धविवेक का कथन है कि 'द्रव्यत्याग' वेद के शब्दों द्वारा विहित (वेदबोधत) है और त्यागी हुई वस्तु सुपात्र ब्राह्मण को (पात्रालम्भनपूर्वक) दी जाती है। श्राद्धप्रकाश में 'प्रतिपत्ति' का अर्थ है यज्ञ में प्रयुक्त किसी वस्तु की अन्तिम परिणति, जैसा कि दर्शपूर्णमास यज्ञ में 'सह शाखया प्रस्तरं प्रहरति' नामक वाक्य आया है। यहाँ 'शाखाप्रहरण' 'प्रतिपत्तिकर्म' है (जैमिनि. 4|2|10-13) न कि अर्थकर्म। इसी प्रकार आहिताग्नि के साथ उसके यज्ञपात्रों का दाह प्रतिपत्तिकर्म है (जहाँ तक यज्ञपात्रों का सम्बन्ध है)।
  2. यह दृष्टिकोण यदि भारोपीय (इण्डो यूरोपीयन) नहीं है तो कम से कम भारत पारस्य (इण्डो ईरानियन) तो है ही। प्राचीन पारसी शास्त्र फ्रवशियों (फ्रवशीस=अंग्रेज़ी बहुवचन} के विषय में चर्चा करते हैं, जो आरम्भिक रूप में प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों में प्रयुक्त 'पितृ' या प्राचीन रोमकों (रोमवासियों) का 'मेनस' शब्द है। वे मृत लोगों के अमर एवं अधिष्ठाता देवता थे। क्रमश: 'फ्रवशी' का अर्थ विस्तृत हो गया और उसमें देवता तथा पृथ्वी एवं आकाश जैसी वस्तुएँ भी सम्मिलित हो गयीं, अर्थात् प्रत्येक में फ्रवशी पाया जाने लगा।
  3. आपस्तम्ब धर्मसूत्र (2|7|16|1-3
  4. काठक गृह्यसूत्र (61|3
  5. जैमिनिय गृह्यसूत्र (2|3
  6. शांखायन गृह्यसूत्र (3|12|2
  7. पार. गृह्यसूत्र (3|3
  8. खादिरगृह्यसूत्र (3|3|29-30
  9. इसी से गोभिलगृ. 3|10|9 ने इसे अपूपाष्टका कहा है
  10. खादिरगृह्यसूत्र (3|4|1
  11. आश्वलायन गृह्यसूत्र (2|4|7-10
  12. गोभिलगृह्यसूत्र (4|1|18-22
  13. कौशिक (138|2
  14. बौधायन गृह्यसूत्र (2|11|51|61
  15. स्कन्दपुराण (नागरखण्ड, 215|24-25) में आया है–दृश्यन्ते बहवो भेदा द्विजानां श्राद्धकर्मणि। श्राद्धस्य बहवो भेदा: शाखाभेदैर्व्यवस्थिता:।।
  16. यथा–अनुशासनपर्व, अध्याय 87-92
  17. बिब्लिओथिका इण्डिका माला, 1716 पृष्ठों में
  18. टोडरानन्द का एक भाग
  19. आपस्तम्ब धर्मसूत्र (2|7|16|8-22
  20. अनुशासन पर्व (87
  21. वायु पुराण (99|10-19
  22. याज्ञवल्क्य (1|262-263
  23. ब्रह्म पुराण (220|15|21
  24. विष्णु धर्मसूत्र (78|36-50
  25. कूर्म पुराण (2|20|17-22
  26. ब्रह्माण्ड पुराण(3|17|10-22
  27. आपस्तम्ब धर्मसूत्र (7|17|23-25
  28. मनु (3|280
  29. विष्णुधर्मसूत्र (77|8-9
  30. कूर्म पुराण (2|16|3-4
  31. ब्रह्माण्ड पुराण (3|14|3
  32. भविष्य पुराण (1|185|1
  33. मनु (2|206-207
  34. याज्ञवल्क्य (1|227
  35. शंख (परा. मा. 1|2, पृष्ठ 303; श्रा. प्र. पृष्ठ 140; स्मृतिच., श्रा., पृष्ठ 385
  36. कूर्म पुराण (2|22|17

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