उमराओ गाँव  

उमराओ गाँव श्रीकृष्ण तथा राधा जी की लीला स्थली है, जो ब्रजमण्डल में छत्रवन (वर्तमान छाता) से लगभग चार-पाँच मील की दूरी पर पूर्व दिशा में अवस्थित है।

प्रसंग

एक समय सखियों ने ललिता के पास कृष्ण के विरुद्ध शिकायत की।[1] ललिता जी ने क्रोधित होकर कहा- "ऐसा कौन है? जो राधिका के राज्य को अपने अधिकार में कर सकता है। हम इसका प्रतिकार करेंगी।" ऐसा कहकर राधिका जी को एक सुन्दर सिंहासन पर पधारकर उमराव होने की घोषणा की। 'उमराओ' का तात्पर्य राज्य के अधिपति से है। चित्रा सखी ने उनके सिर पर छत्र धारण किया, विशाखा चामर ढुलाने लगी, ललिता जी राधिका के बाँए बैठकर मन्त्री का कार्य करने लगी। कोई सखी उन्हें पान का बीड़ा देने लगी तथा अवशिष्ट सखियाँ प्रजा का अभिनय करने लगीं।

राधिका जी ने सिंहासन पर बैठकर सखियों को आदेश दिया- "जाओ, जो मेरे राज्य पर अधिकार करना चाहता है, उसे पराजित कर तथा बाँधकर मेरे सामने उपस्थित करो।"[2] उमराव का आदेश पाकर सहस्त्र-सहस्त्र सखियों ने हाथों में पुष्प छड़ी लेकर युद्ध के लिए यात्रा की। अर्जुन, लवंग, भृंग, कोकिल, सुबल और मधुमंगल उन्हें देखकर इधर-उधर भागने लगे, परन्तु किसी चतुर सखी ने मधुमंगल को पकड़ लिया और उसे पुष्प माला द्वारा बाँधकर उमराव के चरणों में उपस्थित किया तथा कुछ गोपियाँ मधुमंगल को दो-चार गंल्चे भी जड़कर बोलीं- "हमारे उमराव के राज्य पर अधिकार करने का इतना साहस? अभी हम तुम्हें दण्ड देती हैं।" मधुमंगल पराजित सेनापति की भाँति सिर नीचे कर कहने लगा- "ठीक है! हम पराजित हैं, किन्तु दण्ड ऐसा दो कि हमारा पेट भरे।" ऐसा सुनकर महारानी राधिका हँसकर बोली- "यह कोई पेटू ब्राह्मण है, इसे मुक्त कर दो।" सखियों ने उसे पेटभर लड्डू खिलाकर छोड़ दिया। मधुमंगल लौटकर छत्रपति महाराजा कृष्ण को अपने बँध जाने का विवरण सुनाकर रोने का अभिनय करने लगा। ऐसा सुनकर कृष्ण ने मधुमंगल और सखाओं को लेकर उमराओ के ऊपर आक्रमण कर दिया।

जब राधिका ने अपने प्राण वल्लभ श्रीकृष्ण को देखा तब बड़ी लज्जित होकर अपने उमराव वेश को दूर करने के लिए चेष्टा करने लगीं। सखियाँ हँसती हुई उन्हें ऐसा करने से रोकने लगीं। मधुमंगल ने छत्रपति बने हुए श्रीकृष्ण को उमराव राधिका के दक्षिण में बैठा दिया। दोनों में संधि हुई तथा कृष्ण ने राधिका जी का आधिपत्य स्वीकार किया। मधुमंगल ने राधिका के प्रति हाथ जोड़कर कहा- "कृष्ण का अंगरूपी राज्य अब तुम्हारे अधिकार में हैं। अब जो चाहो इनसे भेंट ग्रहण कर सकती हो।" सारी सखियाँ और सखा इस अभिनय क्रीड़ा-विलास को देखकर बड़े आनन्दित हुय।

उमराव लीला के कारण इस गाँव का नाम उमराओ है। यह स्थान राधास्थली के रूप में भी प्रसिद्ध है। तत्पश्चात् पूर्णमासी जी ने यहाँ पर राधिका को ब्रजेश्वरी के रूप में अभिषिक्त किया। यहाँ किशोरी कुण्ड भी है। श्रीलोकनाथ गोस्वामी यहीं पर भजन करते थे। किशोरी कुण्ड से ही श्रीराधाविनोद-विग्रह प्रकट हुए थे। ये श्रीराधाविनोद जी ही लोकनाथ गोस्वामी आराध्यदेव हैं। अब यह श्रीविग्रह जयपुर में विराजमान हैं। उमराओ गाँव के पास ही धनशिंगा गाँव है।


इन्हें भी देखें: कोकिलावन, ब्रज एवं कृष्ण

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. "ललितादि सखी क्रोधे कहे बार बार। राधिकार राज्य के करये अधिकार। ऐछे कत कहि ललितादि सखीगण। राधिकारे उमराओ कैला ईक्षण ॥"भक्तिरत्नाकर
  2. मोर राज्य अधिकार करे येई जन। पराभव करि तारे आन एई क्षण ॥ भक्तिरत्नाकर)

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